मुंबई. एक ऐसी नज़्म जो साहिर के मिजाज़ के खिलाफ तो नहीं कही जा सकती लेकिन यह जरूर कहा जा सकता है कि यह उनके मिजाज़ का एक दुर्लभ (रेयर)पहलू है। हिंदी सिनेमा की कामयाबियों के साथ जो दिलचस्प उलटबांसियां या विडंबनाएं जुड़ी हैं, उनमें से एक इसके साथ भी है। साहिर, जो शायर अपनी प्रगतिशील सोच, तीखे तेवर और कठिन या कड़वे शब्द-विचारों के लिए जाना जाता रहा, उसने हिंदी सिनेमा को सबसे ज्यादा रोमांटिक गीतों में से एक अदा किया। हालांकि फिल्मी गीत मूल नज़्म से अलग है।
एक ऐसी नज़्म जो भाव और शिल्प के स्तर पर तो तकरीबन हर दिल को अपनी कहानी ही मालूम होती है लेकिन इस नज़्म में भी वही खूबसूरती है जो ‘खूबसूरत मोड़’ में है। एक ऐसा ख़्याल जिसके लिए शायद हर कलाकार पूरी जिंदगी कुर्बान करने को तैयार हो जाए। गहरे अर्थो में झांके तो यह जिंदगी के सच से घबराकर खुद को रंगीन ख़्वाबों में छुपा देने की नज़्म नहीं बल्कि उस थकान को आराम देने, उस संघर्ष को संबल देने या उस लड़ाई को प्रेरणा देने की नज़्म है जो ज़िंदगी के सच और हक़ को पाने के लिए लड़ी जा रही है।
लड़ते-लड़ते जब इंसान की हिम्मत टूटने लगती है तब उसे एक प्रेरणा और एक सहारे की जरूरत होती है। ‘पुकारतीं मुझे जब तल्ख़ियां ज़माने की..’ यहां मुसीबतों से घबराने का मंज़र ज़रूर दिखता है लेकिन पीछे का संदेश यही है। परतें तो इस नज़्म में कई तलाशी जा सकती हैं लेकिन रोमांस ही अगर इसका मूल विषय मान लिया जाए तो उस संदर्भ में यह सुंदर और नायाब नज़्म के तौर पर हमेशा याद की जाएगी।
नज़्म
कभी-कभी मेरे दिल में ख़याल आता है
कि ज़िंदगी तेरी ज़ुल्फ़ों की नर्म छांव में गुजरने पाती
तो शादाब हो भी सकती थी
ये तीरग़ी जो मेरी ज़ीस्त का मुक़द्दर है
तेरी नज़र की शुआओं में खो भी सकती थी
अजब न था कि मैं बेगाना-ए-अलम होकर
तेरे जमाल की रानाइयों में खो रहता
तेरा गुदाज़ बदन तेरी नीमबाज़ आंखें
इन्हीं हसीन फ़ज़ाओं में महव हो रहता
पुकारतीं मुझे जब तल्ख़ियां ज़माने की
तेरे लबों से हलावत के घूंट पी लेता
हयात चीखती फिरती बरहना सर और मैं
घनेरी ज़ुल्फ़ों के साये में छुपके जी लेता
मगर ये हो न सका
मगर ये हो न सका और अब ये आलम है
कि तू नहीं तेरा ग़म तेरी जुस्तजू भी नहीं
गुज़र रही है कुछ इस तरह ज़िंदगी जैसे
इसे किसी सहारे की आरज़ू भी नहीं
ज़माने भर के दुखों को लगा चुका हूं गले
गुज़र रहा हूं कुछ अनजानी रहगुज़ारों से
मुहीब साये मेरी सिम्त बढ़ते आते हैं
हयात-ओ-मौत के पुरहौल खारज़ारों से
न कोई जादा न मंज़िल न रौशनी का सुराग़
भटक रही है ख़लाओं में ज़िंदगी मेरी
इन्हीं ख़लाओं में रह जाऊंगा कभी खोकर
मैं जानता हूं मेरी हमनफ़स मगर यूं ही
कभी-कभी मेरे दिल में ख़याल आता है..