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मैं पल दो पल का शायर हूं

मुंबई.
दुनिया ने तजरुबात-ओ-हवादिस की श़क्ल में जो कुछ मुझे दिया है वो लौटा रहा हूं मैं।
साहिर किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। ‘पल दो पल’ के इस शायर ने साहित्य और फ़िल्म की दुनिया के आक़ाश में एक ऐसी चमक क़ायम कर दी जो सदियों तक आबाद रहेगी। साहिर एक क्रांतिकारी शायर थे। इसकी पूरी झलक इनके ग़ीतों और शायरी में नजर आती है। जो ज़िंदग़ी पे गुज़री उसे शब्दों में ढालते गए। एक शेर में साहिर ने कहा भी‘दुनिया ने तजरुबात-ओ-हवादिस की श़क्ल में जो कुछ मुझे दिया लौटा रहा हूं मैं’। 25 अक्टूबर 1980 को साहिर ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया। इस महान शायर और गीतकार को भास्कर डॉट कॉम की श्रद्धांजलि।

प्रारंभिक जीवन
साहिर का जन्म 8 मार्च 1921 को पंजाब के लुधियाना में एक ज़मींदार घराने में हुआ था। उनका नाम अब्दुलहई साहिर था। ज़मींदार घराने में जन्म लेने के बावजूद साहिर की शुरुआती जिंदगी अभावों के बीच गुजरी। कारण था उनके माता और पिता में अलगाव होना। साहिर के पिता ने दूसरी शादी कर ली थी।

लाहौर में अमृता से मुलाकात
साहिर ने लुधियाना के ख़ालसा कॉलेज से स्नातक की पढ़ाई पूरी की। इसके बाद 1939 में वे लाहौर चले आए। लाहौर के सरकारी कॉलेज़ में उन्होंने दाख़िला लिया। यहीं उनकी मुलाक़ात अमृता प्रीतम से हुई थी। अमृता प्रीतम से उनके प्यार के क़िस्से आम हो गए। बाद में साहिर को कॉलेज से निकाल दिया गया।

पहली किताब
कॉलेज से निकाले जाने के बाद साहिर ने अपनी पहली क़िताब पर काम शुरू कर दिया। 1943 में उन्होंने ‘तल्ख़ियां’ नाम से अपनी पहली शायरी की किताब प्रकाशित करवाई। ‘तल्ख़ियां’ से साहिर को एक नई पहचान मिली। इसके बाद साहिर ‘अदब़-ए-लतीफ़’, ‘शाहकार’ और ‘सवेरा’ के संपादक बने। साहिर प्रोग्रेसिव राइटर्स एसोसिएशन से भी जुड़े रहे थे। ‘सवेरा’ में छपे कुछ लेख से पाकिस्तान सरकार नाराज़ हो गई और साहिर के ख़िलाफ वारंट जारी कर दिया दिया। 1949 में साहिर दिल्ली चले आए। कुछ दिन दिल्ली में बिताने के बाद साहिर मुंबई में आ बसे। साहिर ने ‘परछाइयां‘ नाम की एक क़िताब की भी रचना की थी।

फ़िल्मों में साहिर
साहिर लुधियानवी को फ़िल्म ‘आज़ादी की राह पर’ में पहली बार ग़ीत लिखने का मौका मिला था। 1949 में बनी इस फिल्म के चार गाने साहिर ने लिखे थे। इस फिल्म का पहला गाना था ‘बदल रही है जिंदगी’। साहिर को जिस फिल्म से इंडस्ट्री में पहचान मिली वो फिल्म थी ‘नौजवान’। 1951 में बनी इस फिल्म के संगीतकार थे एसडी बर्मन। ‘नौजवान’ फिल्म का गीत ‘ठंडी हवाएं लहरा के आएं’ काफी लोकप्रिय हुआ था। इसी साल गुरुदत्त की फिल्म ‘बाज़ी’ भी रिलीज हुई। इसका गीत संगीत भी काफी लोकप्रिय हुआ। इसमें भी साहिर को एसडी बर्मन के साथ काम करने का मौका मिला। इसके बाद साहिर और एसडी बर्मन की जोड़ी लोकप्रिय हो गई। इस जोड़ी ने कई हिट गाने दिए। जाल, टैक्सी ड्राइवर, हाउस नंबर-44, मुनीम जी जैसी फिल्मों एसडी बर्मन और साहिर की जोड़ी ने बेहतर गीतों के जरिए श्रोताओं का मन मोह लिया।

हालांकि फिल्म ‘प्यासा’ के बाद एसडी बर्मन और साहिर की जोड़ी अलग हो गई। इसके बाद साहिर ने रोशन और खय्याम के साथ मिलकर कई हिट गाने दिए। वर्ष 1963 में ‘ताजमहल’ फिल्म के गीतों के लिए उन्हें फिल्म फेयर का अवार्ड मिला था। सत्तर के दशक में साहिर ने खासतौर पर यश चोपड़ा की फिल्मों पर ही काम किया। 1976 में फिल्म कभी कभी के गीत भी साहिर ने लिखे। फिल्म का टाइटल सांग उनकी नज़्मों के आधार पर तय किया गया। ‘कभी कभी मेरे दिल में ख़्याल आता है’ गाना सुपर हिट हुआ। इस गाने के लिए भी साहिर को फिल्म फेयर अवार्ड मिला था।

साहिर का व्यक्तित्व
साहिर बेहद संवेदनशील होने साथ ही बेहद स्वाभिमानी भी थे। वे अक्सर इस बात पर अड़ जाते थे कि पहले मैं गाने लिखूंगा उसके बाद गाने के आधार पर धुन बनाई जाएगी। साहिर ने फिल्म इंडस्ट्री में गीतकारों को एक नई जगह दिलाई। साहिर की लोकप्रियता काफी थी और वे अपने गीत के लिए लता मंगेश्कर को मिलने वाले पारिश्रमिक से एक रुपया अधिक लेते थे। इसके साथ ही ऑल इंडिया रेडियो पर होने वाली घोषणाओं में गीतकारों का नाम भी दिए जाने की मांग साहिर ने की जिसे पूरा किया गया। इससे पहले किसी गाने की सफलता का पूरा श्रेय संगीतकार और गायक को ही मिलता था।

अकेला बहुत देर चलता रहा
साहिर ने शादी नहीं की और उनकी जिंदगी बेहद तन्हा रही। साहिर का साथ किसी ने नहीं दिया मगर वे नग़्मों से लोगों की वाहवाहियां लूटते रहे। तन्हाई और प्रेम के अभाव में साहिर का स्वभाव विद्रोही हो गया था। पहले अमृता प्रीतम के साथ प्यार की असफलता और इसके बाद गायिका और अभिनेत्री सुधा मल्होत्रा के साथ भी एक असफल प्रेम से जमीन पर सितारों को बिछाने की हसरत अधूरी रह गई। इसका जिक्र साहिर के इस गाने में पूरी तरह उभरता है ‘तुम अगर साथ देने का वादा करो... ‘मैं अकेला बहुत देर चलता रहा, अब सफर ज़िंदगानी का कटता नहीं’। साहिर अपने अकेलेपन और फिक्र को शराब और सिगरेट के धुंए में उड़ाते चले गए। अंतत: 25 अक्टूबर 1980 को हार्ट अटैक होने से साहिर लुधियानवी हमेशा के लिए इस दुनिया को अलविदा कह गए।

साहिर के दस गाने
1 मैं पल दो पल का शायर हूं2 तुम अगर साथ देने का वादा करो3 ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है4 मैं ज़िंदगी का साथ निभाता चला गया5 जाने वो कैसे लोग थे जिनके प्यार को प्यार मिला6 नग़्मा-ओ-शेर की सौगात किसे पेश करूं7. तोरा मन दर्पण कहलाए8. अल्लाह तेरो नाम, ईश्वर तेरो नाम9. कभी-कभी मेरे दिल में ख़्याल आता है10. छू लेने दो नाजुक होठों को कुछ और नहीं...





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