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‘बड़े तीसमारखां बने फिरते हैं, घर में मूंछें नीची’

सांवलियाजी. कार्यसमिति में वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने सभी पार्टीजनों को मुंह पर लगाम देने और संयमित भाषा के इस्तेमाल की सलाह दी लेकिन उनकी किसी ने नहीं सुनी। वे बैठे रहे और मुख्यमंत्री छठी का दूध याद दिलाने, माई के लाल और ‘पुराने किले’ वाले तेवरों से भी आगे बढ़ गई।

वसुंधरा ने असंतोष की गतिविधियों को पुरुष बनाम महिला के संघर्ष के रूप में पेश करते हुए कहा कि पुरुष बाहर तो मूंछें ऊंची करके अकड़ रहे हैं, लेकिन घर के भीतर उनकी क्या हालत है, ये वही जानते हैं। उन्होंने कहा कि एक महिला सब कुछ कर लेती है तो पुरुषों को बर्दाश्त नहीं होता। वे खुद थोड़ा-सा भी कर लेते हैं तो खुद को तीसमारखां समझने लगते हैं।

यही नहीं वसुंधरा ने दोहराया कि अब लोग राजस्थान में खंडहरों को देखने नहीं, निवेश, नई ऊर्जा और विकास के आंदोलन में सहभागिता के लिए आ रहे हैं। उन्होंने कहा कि विकास करना आसान काम नहीं है, लेकिन झगड़ा-फसाद करना आसान है।

मुख्यमंत्री ने विरोधियों पर आरोप लगाया कि उन्होंने प्रदेश के एक परिवार में फूट डाल दी है। जातियों को लड़ा दिया है। मजहबों को आमने-सामने खड़ा कर दिया है। मुख्यमंत्री ने कहा : मेरी नजर में तो दो ही जातियां हैं। एक पुरुष जाति, एक महिला जाति और ये दोनों जातियां एक-दूसरे के बिना नहीं रह सकतीं। उन्होंने कहा कि महिला जाति इज्जत और स्वाभिमान से जूझकर देवी का रूप धारकर राजस्थान का परचम लहराने निकल पड़ी हैं।

अरे, थके हुए क्यों हो?
मुख्यमंत्री ने बैठक में ढीले-ढाले और सुस्त अंदाज में बैठे मंत्रियों को भी फटकार लगा दी। जल संसाधन राज्य मंत्री सुरेंद्रसिंह राठौड़ को तो उन्होंने यहां तक कह डाला : अरे सुरेंद्रसिंह राठौड़, तुम मुझे थके हुए क्यों लग रहे हो। इसके बाद उन्होंने कहा कि कोई भी हिम्मत नहीं खोए। समस्याओं और शंकाओं की सारी बाधाएं मिलकर पार कर लेंगे।

उन्होंने यह कविता भी पढ़ी :
ढूंढ़ सकते हो तो इस माटी में सोना है।
हिम्मत का हथियार नहीं खोना है।
शंकाओं के सागर तो हम तर जाएंगे,
इस मरुधरा को हम स्वर्ग बनाएंगे।





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