अभिमत. पाकिस्तान के खिलाफ वन डे सीरीज के पहले दो मैचों से राहुल द्रविड़ को बाहर रखकर चयनकर्ताओं ने बता दिया है कि ट्वेंटी-20 की चमक-दमक से वे अब तक नहीं उबरे हैं। उनके फैसले के पीछे कोई सुविचारित नीति नजर नहीं आती।
द्रविड़ को बाहर करते वक्त ‘आराम’ शब्द का प्रयोग किया गया है। क्या इससे यह अर्थ लगाया जाए कि वास्तविक अर्थो में आराम देकर उसमें बाकी क्रिकेट को बाहर आने दिया जाएगा? सार्थक क्रिकेट खेलते हुए किसी गौरवमयी दौर में अपनी मर्जी से अलविदा कहने का मौका दिया जाएगा? दो साल पहले गांगुली को ऐसा ही आराम दिया गया था और वापसी में उन्हें डेढ़ साल लग गया।
दरअसल, भारतीय क्रिकेट बाजार की धुन पर खेलते-खेलते बाजारू हो गया है। क्रिकेट प्रतिष्ठान के रूप में बीसीसीआई की अपनी कोई सोच, कोई रणनीति और अपना कोई वजन नजर नहीं आता। लगता ऐसा है कि फैसले लेते समय उसके दिमाग में क्रिकेट की गहरी समझ से दूर का भी नाता न रखने वाले टीवी चैनल के शोर मचाते एंकरों की छवि रहती है।
वरना मध्यक्रम के भरोसेमंद बल्लेबाज के रूप में 333 वनडे मैचों में दस हजार से ज्यादा और 112 टेस्ट मैचों में करीब दस हजार रन बना चुके द्रविड़ के साथ ऐसा व्यवहार नहीं किया जाता।
वीडियो क्लिप्स के आधार पर हर खिलाड़ी के लिए रणनीति बनाकर खेलने वाली सशक्त ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ एक खराब सीरीज ही द्रविड़ का हश्र तय करने के लिए काफी नहीं। वरना बिस्ट्रल में उनकी धुआंधार 92 रनों की विजयी नाबाद पारी को ज्यादा समय नहीं हुआ है। आज टीम में ऐसा कौन है जो बीस रनों के अंदर तीन विकेट गिरने पर नई गेंद का सामना कर सके?
वास्तव में असाधारण योगदान देने वाले खिलाड़ियों के बारे में सिर्फ एक-दो सीरीज के आधार पर फैसला करना ही गलत है। उन्हें कुछ रियायत तो देनी होगी। द्रविड़ के मामले में तो यह और भी जरूरी है क्योंकि टीम में पांच तो ओपनर ही हैं। जाहिर है मध्यक्रम के भरोसे को यूं खत्म करना टीम को मझधार में छोड़ने के बराबर है।