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सुहाग व सुख की मंगल कामना का पर्व

करवा चौथ. कार्तिक मास की कृष्ण चतुर्थी को मनाए जाने वाले करवा चौथ पर्व का सुहागिनों को बेसब्री से इंतजार रहता है। मान्यता है कि विधि-विधान से करवा चौथ व्रत करने पर जन्म-जन्म तक पति-पत्नी सुखमय जीवन व्यतीत करते हैं। एक पौराणिक कथा के अनुसार अजरुन इन्द्रकील पर्वत पर तप करने के लिए गए थे।

उनकी अनुपस्थिति में द्रोपदी उदास रहने लगीं और उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण से कोई ऐसा व्रत बताने की प्रार्थना की जिसे करने से पति की लंबी आयु और सुखमय जीवन की प्राप्ति हो। द्रोपदी के आग्रह पर भगवान श्रीकृष्ण ने पूरी श्रद्धा से करवा चौथ व्रत करने के लिए कहा। द्रोपदी ने चतुर्थी के दिन यह व्रत किया जिसके कल्याणकारी प्रभाव से कौरवों को पराजित कर पांडव अपने राज्य को फिर से पाने में सफल रहे।

एक अन्य कथा के अनुसार प्राचीन समय में इन्द्रप्रस्थ नामक शहर में वेद नामक एक विद्वान पंडित रहता था। उसके सात पुत्र व एक पुत्री थी। पुत्री का नाम वीरांवति था। वीरांवति अत्यंत सुंदर व सर्वगुण संपन्न थी। वीरांवति का विवाह देव नामक एक विद्वान पंडित से हुआ।

वीरांवति ने मायके जाकर अपनी भाभियों के साथ करवा चौथ का व्रत रखा। सारा दिन निराहार रहकर वीरांवति निढाल होकर जमीन पर गिर गई। वीरांवति से बेहद प्रेम करने वाले सात भाइयों से बहन की ऐसी हालत देखी न गई और उन्होंने एक वृक्ष पर चढ़कर मशाल जलाई और नकली चन्द्रमा बनाकर वीरांवति को दिखा दिया।

भाइयों की तरकीब से अनभिज्ञ वीरांवति ने चन्द्रमा को अघ्र्य देकर व्रत समाप्त कर लिया लेकिन व्रत खंडित होने के कारण उसे कष्ट सहना पड़ा। सच्चे हृदय से की गई पुकार पर इन्द्राणी देवी ने वीरांवति को दर्शन देकर उसे फिर से व्रत करने के लिए कहा। इन्द्राणी का आशीर्वाद पाकर वीरांवति ने फिर से करवा चौथ का व्रत किया और पति को पुन: पाकर खुशी-खुशी जीवनयापन करने लगी।





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