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मोदी को मुद्दा बनाने से पहले

दृष्टिकोण. तहलका की ताजा सनसनी के बाद बने वातावरण में गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व के गुण-दोष की चर्चा जोर-शोर से हो रही है। ऐसे में हमें जानना चाहिए कि नेता होते कौन हैं? वे जो मार्ग प्रशस्त करें अथवा वे जो आम लोगों की भांति किसी के पीछे-पीछे चल निकलें?

सवाल उठता है कि क्या मनमोहन सिंह व मायावती से लेकर देश के हजारों सांसद व विधायक सही अथरे में नेता हैं। जवाब है नेता अर्थात वह व्यक्ति जो स्वयं कोई पथ प्रशस्त करे, खुद उसका अनुसरण करते हुए अन्य लोगों को उस पर चलने की प्रेरणा दे। इस लिहाज से महात्मा गांधी नेता थे। उन्होंने सत्याग्रह के रूप में अपने आत्म अनुभव को शिद्दत के साथ जिया तो करोड़ों लोग सहर्ष उनका अनुसरण करने लगे।

गांधीजी के बाद विनोबा भावे नेता हुए। विनोबाजी की बात मान कर हजारों लोगों ने स्वेच्छा से भूमिदान किया। फिर जयप्रकाश नारायण (जेपी) स्वस्फूर्त नेता हुए और तत्कालीन सरकार-शासन के खिलाफ जनमत तैयार कर इंदिरा गांधी को सत्ताच्युत करने में सफल रहे। अब आप स्वयं से पूछें कि जेपी के बाद देश में ऐसे कितने नेता हुए जिन्होंने जनमानस को प्रभावित कर उसका रुख बदला हो।

कहने का तात्पर्य है कि नेता वही है जिसकी बात लोग मानें तथा उसके बताए मार्ग का अनुसरण करते हुए आचरण करें। इस प्रकार मौजूदा समय में कुछ धर्मगुरु ही नेता की श्रेणी में गिने जा सकते हैं। बाबा रामदेव, मोरारी बापू, आसाराम बापू, श्री रविशंकर, मां आनंदमयी आदि। सूची लंबी है। इन लोगों का जनमानस पर गहरा प्रभाव है। लोग इनके कहे अनुसार आचरण करने की कोशिश करते हैं।

आदेश-आज्ञा सिर-माथे पर चढ़ा कर मंदिरों, आश्रमों व अन्य आस्था स्थलों का निर्माण करते हैं, शिविरों का आयोजन करते हैं, जरूरत पड़ने पर विरोधियों को जवाब भी देते हैं। बाकी नेताओं को गिनता कौन है? मसलन, मनमोहन सिंह अमेरिका के साथ परमाणु करार की वकालत करते नहीं अघाते मगर समर्थक दल ही उनकी बात सुनने को तैयार नहीं है। मोदी एक ही अनुरोध करते नजर आते हैं दंगों को भूल जाओ तथा राज्य के विकास पर ध्यान लगाओ। पर सुनता कौन है?

अब मुद्दे की बात- हम जिन्हें नेता समझते हैं वे सिर्फ कुछ दिनों के लिए चुने गए शासक भर होते हैं। इससे अधिक कुछ नहीं। शासक के रूप में चुने गए लोगों का महत्व उनके कार्यकाल से ज्यादा नहीं होता। स्थानीय निकायों में भाजपा-कांग्रेस अथवा अन्य कोई भी दल सत्तारूढ़ क्यों न हो उसे लोगों के घरों में पानी पहुंचाना ही होगा अन्यथा महिलाएं मटके लेकर संबंधित कार्यालयों पर धावा बोल देंगी।

राष्ट्रीय स्तर पर देखें। देश में उदारीकरण का श्रीगणोश 1990 के दशक में हुआ और अब भी जारी है। इस अवधि में कई सरकारें आईं व गईं। इस सिलसिले का उदारीकरण की स्थिति पर कोई असर पड़ा? जवाब है नहीं।

खैर, एक और चर्चा चल रही है कि 2002 में गुजरात में मोदी की सरकार नहीं होती तो दंगों की तस्वीर इतनी भयावह नहीं होती। इस बारे में एक दलील यह भी दी जा सकती है कि गोधरा कांड के बाद के दंगों में मोदी के स्थान पर कोई और नेता होता तो शायद दंगाइयों को खुली छूट न मिलने पर रक्तपात कम होता।

इस क्रम में तहलका के ताजा खुलासे को सच माना जाए तो नरेंद्र मोदी ने हिंदुओं को रोष प्रकट करने के लिए तीन दिन दिए। संभव है कि यदि तीन दिन नहीं दिए जाते तो रोष लंबे समय तक अलग-अलग रूपों में प्रकट होता। यह कोई कल्पना नहीं है।

1992 में मुंबई में दंगे भड़कने के समय महाराष्ट्र में किसी हिंदू हृदयसम्राट का नहीं बल्कि कांग्रेसी शरद पवार का शासन था। उन्होंने किसी को कोई छूट नहीं दी, फिर भी उनके शासनकाल में डेढ़ माह तक दंगे चले तथा 900 लोगों को जान गंवानी पड़ी।

कहने का अर्थ है कि ‘किंतु-परंतु’ छोड़ कर मुद्दे की बात करिए। 2002 के दंगों के बाद गुजरात में क्या हुआ? चुनाव। चुनावों में नरेंद्र मोदी को स्पष्ट जनादेश मिला। मतलब जनता ने संदेश दिया कि यदि मोदी सांप्रदायिक-फासीवादी हैं तो हम भी ऐसे ही हैं। हमें अपने जैसा ही नेता चाहिए। यह बात इस तथ्य को रेखांकित करती है कि अंतत: जोर जनता का ही चलता है।

जनता मेहरबान तो नेता पहलवान!
मौजूदा हालात में जिधर देखो उधर मोदी की ही बातें हो रही हैं पर असली मुद्दा है कि मोदी अगर पिरामिड का शिखर हैं तो इस पिरामिड का असली आधार जनता है। देश शासक नहीं जनता चलाती है। अमेरिका 43 राष्ट्रपति देख चुका है। वह एक-दो राष्ट्रपति के बल पर नहीं बल्कि विश्वभर से पलायन कर वहां पहुंचे जोशीले लोगों की ताकत से आज विश्व पर दादागीरी कर रहा है।

मतलब कि देश का नेता भले ही महान हो, यदि वहां के किसान आलसी, व्यापारी कालाबाजारी तथा कर्मचारी कामचोर हुए तो वह देश अपने महान नेता सहित अधोगति को प्राप्त होता है। बात बिलकुल सीधी है। इस पर भी देश-राज्यों में चुनाव होने पर ऐसा प्रचारित किया जाता है कि मानो पूरे देश अथवा राज्य का भविष्य चुनावों पर ही टिका हुआ है।

हालांकि चुनावों के माध्यम से अच्छे शासक का चयन करने के बारे में हम सबको जागरूक होना ही पड़ेगा क्योंकि जनता की अगुवाई में देश तेजी से प्रगति करता है जबकि शासक इसमें कुछ हद तक योगदान दे सकता है। इसलिए चुनावों में यदि हम उत्साही, विकास आग्रही तथा दूरदर्शी नेता (शासक) चुनने को लेकर उत्साहित होते हैं तो कुछ गलत नहीं है।

अच्छे नेता के अभाव में कम से कम खराब नेता को चुनने हेतु मत दिया जा सकता है लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि सिर्फ मतदान करके ही नागरिक के रूप में हमारे कर्तव्यों की इतिश्री नहीं हो जाती। हकीकत में हम सब प्रतिदिन हजारों बार मत देते हैं। उदाहरण के लिए दीवार पर थूकना चाहिए या नहीं, कामचोरी करना अथवा रिश्वत के लेन-देन आदि इन बिंदुओं पर हम लोग जो निर्णय करते हैं वे मतपेटिकाएं भरने से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हैं।

खैर, जहां तक हिंदुत्ववादी नरेंद्र मोदी को असली मर्द तथा मुस्लिम कट्टरपंथी गोधरा कांड वाले बिलाल-पानवाला आदि को शेर के बच्चे मानते रहेंगे तब तक अकेले मोदी के हीरो अथवा खलनायक के रूप में पेश करने से लोगों का कुछ भी भला होने वाली नहीं है। असल नेता तो जनता ही है और देश को दिशा देना भी उसी का काम है।

-लेखक गुजराती पत्रिका अहा! जिदंगी के संपादक हैं।





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