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शहर में महकी महाराष्ट्र की सुगंध

भोपाल. मराठीभाषी समन्वय परिषद के आयोजन मराठी उत्सव के दूसरे दिन शनिवार को नासिक के कलाकारों ने ‘स्वर शिल्प’ का जादू बिखेरा। ओल्ड कैंपियन ग्राउंड पर आज की शाम हिंदी-मराठी गीतों की कर्णप्रिय श्रंखला को सुनते-सुनते तीन घंटे का वक्त कब वक्त गुजर गया, श्रोताओं को मालूम ही नहीं पड़ा।

‘स्वर शिल्प’ की शुरुआत शास्त्रीय रागों की झलक से हुई। इसके लिए नंद, शिवरंजनी, केदार, बहार, मधुकौंस रागों की ‘रागमाला’ सुनाई गई। इसके बाद एक के बाद एक प्रचलित-कम प्रचलित राग का मूल स्वरूप बताया गया और फिर उन पर आधारित क्रमश: हिंदी-मराठी गीत भी। अहीर भैरव, कलावती, जनसम्मोहिनी, पीलू, बागेश्री, यमन, भीमपलासी। ऐसे ही कुछ राग थे जिनमें फिल्मी गीतों के अलावा गजल, भजन, भावगीत, लावणी जैसी सभी उपशास्त्रीय विधाओं का प्रयोग किया गया।

‘स्वरशिल्प’ के गायक कलाकार थे-इंद्रायणी पाटणी, डा. शुभांगी साठे, रागिणी कामतीकर और विवेक केलकर। वाद्यवंृद में शामिल थे गजानन पलसोतकर, आशीष कुलकर्णी, सुनील रत्नपारखी और सतीश पेंडसे। कंपीयरिंग श्याम पाड़ेकर ने की। ट्रस्ट की अध्यक्ष और गायिका इंद्रायणी कहती हैं, ‘हमारी कोशिश उपशास्त्रीय संगीत के जरिए आमजन में शास्त्रीय संगीत की जानकारी देने की होती है।’

झुणका-भाखर, पूरणपोÝी और भी बहुत कुछ..
‘मराठी उत्सव’ अपने विशिष्ट व्यंजनों के लिए भी जाना जाता है। पूरणपोÝी, साबूदान वनड़े, राजगीरा हलुआ, वड़ा पाव, फाड़े, मटक्या ची उसÝ, साटोरी, अप्पे-चटनी, मिसÝपाव, मेथीचे गोटे, दाबेली, थालीपीठ जैसे व्यंजनों को शहरवासी खूब पसंद कर रहे हैं।

उत्सव का सातवां सफल साल
परिषद के अध्यक्ष संजय पांडे ने शहर के मराठीभाषियों को एकत्र करने के मकसद से इस आयोजन की शुरुआत सात साल पहले की थी। उनका कहना है, ‘हमारे खान-पान, संस्कृति से राजधानी को अवगत कराने का इससे अच्छा और कोई माध्यम नहीं हो सकता था। अच्छी बात है, कि इस साल महाराष्ट्र शासन की ओर से हमें सांस्कृतिक गतिविधियां संचालित करने राशि उपलब्ध कराई गई है।’ पांडे बताते हैं, प्रदेश में मराठी प्रकोष्ठ स्थापित किया गया है। उन्हें प्रदेश सरकार से मदद की अपेक्षा है।

>> बीते पांच साल से लगातार इस उत्सव में हमारा परिवार शरीक हो रहा है। ‘खाणं आणि गाणं’ हमारी विशेषता है। अच्छी बात है, कि इस उत्सव में दोनों ही बातों का बखूबी ध्यान दिया जाता है।
ज्योति, विवेक सावरीकर

>> अपने प्रदेश से बाहर रहकर मराठी संस्कृति और खान-पान को जानने का इससे अच्छा और कोई अवसर नहीं होता। हम हर साल इसमें शिरकत करते हैं। इन पांच दिनों में लगता है, जैसे मध्यप्रदेश में महाराष्ट्र उतर आया हो।
मंदा, पी.बी.गंधे

>> हर प्रांत की अपनी विशेषता होती है। मराठी संस्कृति और खान-पान को बेहतर तरीके से प्रस्तुत करने में मराठी उत्सव का बड़ा योगदान है। यह अपनी पूरी ओरिजिनेलिटी के साथ प्रस्तुत होता है।
शैलजा, वी.एस.प्रधान

>> इस उत्सव के लिए हमें साल-भर इंतजार रहता है। एक ही स्थान पर सारे मराठी व्यंजनों की बहार और सांस्कृतिक कार्यक्रम का न केवल मराठियों को बल्कि, हिंदीभाषियों को भी लुभाते हैं। हमें इस उत्सव में शामिल होना बेहद पसंद है।
श्रुति, शिरीष साठे





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