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‘हमने बनाई ऐश्वर्या की साड़ी’

बिलासपुर. स्थानीय राघवेन्द्र राव सभा भवन में इन दिनों चल रहे हथकरघा शिल्प महोत्सव में अंसारी बंधुओं द्वारा राजघरानों में पहनी जाने वाली साड़ियों का जलवा बिखेरा जा रहा है। सिल्क, सिफॉन और पद्मपुरी सिल्क पर जरी-जरदोजी का काम कर एक आम साड़ी का खास बना महिलाओं का मन मोहा जा रहा है।

शिल्प बाजार में शाहिद कमाल अंसारी, इफ्तखार खां और आबिद अंसारी द्वारा साड़ियों की प्रदर्शनी लगाई गई है। ये वो कलाकार हैं, जिनकी बनाई साड़ियां मशहूर फिल्म अभिनेत्री ऐश्वर्या राय ने भी अपनी शादी में पहनी थी। अंसारी बंधुओं के अनुसार साड़ियों को बनाने का काम जबलपुर एवं बनारस में उनके एवं परिवार के लोगों द्वारा किया जाता है।

पिछले 7 पीढ़ी से बुनाई के काम से जुड़े इन लोगों का केवल यही एक धंधा है जिससे उनका परिवार चलता है। शहर की महिलाओं के लिए यहां 25 सौ से लेकर 8 हजार की रेंज में साड़ियां उपलब्ध हैं। साड़ियों की बुनाई के संबंध में इफ्तखार खां बताते हैं कि साड़ियां हैंडलूम से बनाई जाती हैं। एक भरी हुई साड़ी बनाने में एक महीने लग जाते हैं वहीं सामान्य साड़ियां दस से बारह दिनों में बन जाती हैं।

इन साड़ियों की कीमत अधिकतम 2 लाख तक होती है जो केवल आर्डर पर ही बनाई जाती हैं। इसमें सोने की जरी व टेस्टेड जरी से वर्क किया जाता है। उनके अनुसार हस्तशिल्प के इस काम में शासन का तो भरपूर सहयोग मिलता है लेकिन इन साड़ियों की कीमत अधिक होने के कारण कुछ महिलाओं की बेरूखी दिखाई जाती है। वे कहते हैं कि भले ही कुछ लोग इसे महंगा बताते हैं लेकिन कपड़ों की परख रखने वाले लोगों द्वारा यह खूब पसंद की जाती है।

ऐश्वर्या राय की तरह सोनिया गांधी द्वारा पहनी जाने वाली बाघ प्रिंट की साड़ियां भी प्रदर्शनी में आई हुई हैं। मध्यप्रदेश के धार व कोच्छी नामक स्थानों में भीलों द्वारा पहनी जाने वाली साड़ियां अब नए कलेवर के साथ पेश की जा रहीं हैं। शिल्प महोत्सव के व्यवस्थापक एम.एल शर्मा बताते हैं कि भील अपने द्वारा ही बनाये कपड़े पहनते थे।

बाघ प्रिंट उनकी विशेषता थी। 1960 से ईस्माइल सुलेमान से प्रिंट में जान डाल दी गई। उनके बनाए कपड़ों की सोनिया गांधी भी मुरीद हैं। सिल्क और कॉटन पर हर्रा, बहेड़ा अनार के छिलकों के रस से रंगे गए इन कपड़ों पर, फिटकरी और कशिश से प्रिंट किया जाता है। रंगों को पक्का करने के लिए धावड़े के फूल को तांबे की कढ़ाई में पका कर कपड़ों को डुबाया जाता है।

बाघ प्रिंट की साड़ियां बनाने के लिए ईस्माइल सुलेमान को तीन बार राष्ट्रीय पुरस्कार से नवाजा जा चुका है। इसी तरह जबलपुर के फजल इंद्रधनुषीय रंग बिखेरने वाले फिरोजी कपड़े लेकर आए हैं। हस्तशिल्प को बढ़ावा देने के उद्देश्य से यहां ग्राहकों को छूट भी दी जा रही है। वुड आर्ट के लिए राज्य स्तरीय कई पुरस्कार पा चुके चित्रकूट के छोटेलाल लोधी खैराद यानी लकड़ी के खिलौनों से लेकर घरेलू वस्तु लेकर बाजार में आए हैं। जबलपुर के जितेंद्र सुंदर हैंड राइटिंग बनाने की कला यानी कैलोग्राफी सिखा रहे हैं।

मध्यप्रदेश हस्तकला एवं हथकरघा विकास निगम द्वारा चल रही प्रदर्शनी उन अनोखी कलाओं को समेटी हुई है, जो अब लुप्त होती जा रहीं हैं। प्रदर्शनी में शामिल की गई कलाकृतियां, कपड़े व शिल्प मध्यप्रदेश के चंदरी, महेश्वर, पद्मपुरी, भैरागढ़, इंदौर, उज्जैन व नीमच से जुटाए गए हैं। यह प्रदर्शनी 7 नवंबर तक चलेगी। निगम द्वारा राघवेंद्र भवन में ही कुछ माह पूर्व मध्यप्रदेश उत्सव भी आयोजित किया गया था।





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