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अब भी खुला है पिछला दरवाजा

दृष्टिकोण. शेयर बाजार के नियामक भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) ने गुरुवार को पार्टिसिपेटरी नोट्स (पी-नोट्स) के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लागू कर दिए। देश के शेयर बाजारों में कारोबार करने वाले विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफआईआई) द्वारा इस अस्पष्ट इंस्ट्रूमेंट (प्रपत्र) का इस्तेमाल किया जाता है। हालांकि ताजा आदेश पी-नोट्स को पूरी तरह प्रतिबंधित नहीं करता है।

शायद वित्त मंत्रालय को यह कहना पसंद न आए कि पी-नोट्स पर लगी रोक इस बात की मौन स्वीकृति है कि इन इंस्ट्रूमेंट्स का इस्तेमाल गैरकानूनी धन को सफेद बनाने और कारोबार की भाषा में जिसे ‘राउंड ट्रिपिंग’ कहा जाता है, को आसान बनाने के लिए होता रहा है। तेजी से गिरते डॉलर को देश से बाहर छिपाकर रखने में अब कोई मतलब नहीं रह गया इसलिए भारत के धनकुबेर अपने पैसे को वापस यहां लाने के लिए पी-नोट्स का इस्तेमाल कर रहे थे।

कुछ वर्षो के लिए पी-नोट्स के इस्तेमाल पर पूरी तरह रोक लगाने के लिए वित्तमंत्री पी. चिदंबरम पर विश्लेषक और कम्युनिस्ट दबाव डाल रहे थे। भारतीय रिजर्व बैंक एक या दो बार नहीं बल्कि कम से कम तीन बार पी-नोट्स पर प्रतिबंध लगाने का सुझाव दे चुका है। वित्त मंत्रालय के मुख्य आर्थिक सलाहकार की अध्यक्षता वाली एक आधिकारिक समिति में रिजर्व बैंक के प्रतिनिधि ने नवंबर 2005 में इस संबंध में एक असहमति रिपोर्ट दी थी।

सितंबर 2006 के दौरान रिजर्व बैंक के पूर्व डिप्टी गवर्नर एसएस तारापोर ने पूंजी खाते की पूर्ण परिवर्तनीयता संबंधी अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट तौर पर इस बारे में उल्लेख किया था कि पी-नोट्स पर रोक लगा दी जानी चाहिए। इसके बावजूद हैरत की बात है कि नॉर्थ ब्लॉक ने इस मामले पर चुप्पी साधे रखी। क्यों?

16 अक्टूबर को सेबी ने अपनी वेबसाइट पर एक चर्चा पत्र जारी किया। इसमें एफआईआई द्वारा पी-नोट्स के इस्तेमाल पर रोक लगाने का जिक्र किया गया था। उसकी अगली सुबह ही शेयर सूचकांक नौ फीसदी से भी अधिक लुढ़क गए और कारोबार रोकना पड़ गया। इसके बाद वित्तमंत्री ने पहल करते हुए बाजार से ‘संवाद’ किया और बार-बार सभी को यह आश्वासन दिया कि सरकार ने पी-नोट्स पर रोक नहीं लगाई है।

वर्ष 2001 में केतन पारिख घोटाला सार्वजनिक होने के बाद से इन इंस्ट्रूमेंट्स को लेकर काफी बारीकी से बहस हुई है। इनके इस्तेमाल के खिलाफ जो तर्क हैं, वे काफी सीधे हैं और उनमें बार-बार एक ही बात कही गई है। नियमों के मुताबिक ऐसी कंपनियों के लिए ‘नियमित’ अर्थात रेग्यूलेटेड होना अनिवार्य है।

मगर आखिर में नियम से संबंधित यही बात सामने आती है कि कंपनियों को सिर्फ किसी भी मुल्क में ‘पंजीकृत’ अर्थात रजिस्टर्ड होना जरूरी है। इन मुल्कों में टैक्स का स्वर्ग कहे जाने वाला मारीशस जैसा देश भी शांिमल है। 25 अक्टूबर को जारी सेबी के दिशा-निर्देशों में इस खामी को दूर करने की कोशिश की गई है। कुछ मुल्कों में पंजीकृत फर्मो के ‘विनियमों’ या रेग्यूलेशन की गुणवत्ता को लेकर जितना कम कहा जाए उतना ही बेहतर है।

पी-नोट्स का इस्तेमाल करते हुए लेन-देन से लाभान्वित होने वाले ‘अंतिम’ और ‘असली’ लोगों का मामला दूसरा मुद्दा है और इस बारे में पारदर्शिता लाने के लिए अभी कोई पहल नहीं हुई है। कंपनी ‘अ’ को कंपनी ‘ब’ नियंत्रित कर सकती है और हो सकता है कंपनी ‘ब’ को एक ऐसे देश में स्थित कंपनी ‘स’ नियंत्रित करती हो जिस पर भारत सरकार का कानून मानने की कोई बाध्यता नहीं है।

तकनीकी रूप से सेबी के अधिकारी लाभान्वित होने वाले लोगों या कंपनियों के तीन स्तरों तक ‘कापरेरेट आवरण’ हटा सकते हैं या ‘आडिट सत्यापन’ कर सकते हैं। हालांकि ऐसा करने के लिए अधिकारियों की तकनीकी क्षमताओं पर कुछ लोगों को भरोसा नहीं है। असली समस्या तो तब होगी जब कंपनी ‘सी’ को ‘डी’ कंपनी संचालित कर रही हो।

पी-नोट्स के माध्यम से देश में आने वाले धन के वास्तविक स्रोत का पता लगाने का कोई तरीका भारतीय नियामकों के पास नहीं है। ऐसे लेन-देन से लाभान्वित होने वाले असली लोग चतुर कापरेरेट वकीलों की सेवाएं लेते हैं जो उनकी पहचान छिपाने के लिए पी-नोट्स के स्रोत को जटिलता प्रदान करने में माहिर होते हैं।

मगर वित्तमंत्री चिदंबरम को इस बात का पूरा भरोसा है कि देश में काले धन का निवेश रोकने के लिए हमारा कानून पर्याप्त रूप से सक्षम है। 15 मई को राज्यसभा में उन्होंने कहा था कि ‘काले धन को सफेद बनाने के धंधे पर नजर रखने वाली प्रणाली काम कर रही है। मुझे ऐसा कोई वाकया याद नहीं आता कि भारतीय शेयर बाजार में आतंकवादियों का काला धन सफेद हो रहा है।’

वित्तमंत्री उस बहस का जवाब दे रहे थे जो राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एमके नारायणन द्वारा 11 फरवरी को म्यूनिख में दिए गए एक बयान के बाद उपजी थी। नारायणन ने कहा था ‘ऐसे कुछ मामले सामने आए हैं जिनमें आतंकवादी संगठन अपनी साजिशें जारी रखने के मकसद से धन जुटाने के लिए शेयर बाजार का दुरुपयोग कर रहे हैं। मुंबई और चेन्नई के शेयर बाजारों में कुछ अवसरों पर पता चला है कि कुछ फर्जी या कागजी कंपनियां कारोबार में लगी हुई हैं।’

सेबी अध्यक्ष एम दामोदरन ने जब यह कहा कि शेयर बाजार में आतंकी संगठनों द्वारा निवेश किए जाने के कोई प्रमाण उन्हें नहीं मिले हैं, तब वे भी चिदंबरम की बात ही दोहराते नजर आए। उन्होंने कहा कि इसकी जांच के लिए दूसरे नियामक काम कर रहे हैं। वित्त मंत्रालय पी-नोट्स के उपयोग को इस आधार पर सही ठहराता रहा है कि इनके माध्यम से एफआईआई का अधिक धन निवेश होता है।

सेबी ने अब नियामक के साथ नए निवेशकों का पंजीकरण आसान बना दिया है और ‘सामने के दरवाजे’ से प्रवेश को वह प्रोत्साहित कर रहा है। मगर क्या इस स्थिति से चिदंबरम बगैर किसी नुकसान के बाहर आने में कामयाब रहे हैं? पी-नोट्स पर रोक नहीं लगी है। उनके इस्तेमाल को सिर्फ हतोत्साहित किया जा रहा है। वित्तमंत्री के अहम को ठेस नहीं पहुंची है। अलबत्ता उनकी प्रतिष्ठा में कुछ कमी जरूर आई है।

-लेखक रीयलपोलीटिक के संपादक और आर्थिक विश्लेषक हैं।





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