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सांभर झील में कैंसर की रोकथाम के रामबाण

जयपुर. नमकीन पानी वाली सांभर झील में ऐसे सूक्ष्म जीवाणु पाए गए हैं, जो कैंसर की रोकथाम में सहायक हैं। ये बेक्टीरिया डिटरजेंट और ऑर्गेनिक फूड इंडस्ट्रीज में भी उपयोगी हैं। ये नतीजे सांभर झील पर 23 सालों के शोध के बाद सामने आए हैं।

सांभर झील पर वर्ष 1984 से शोध कर रहे एम.जी. साइंस इंस्टीट्यूट, अहमदाबाद के माइक्रोबायोलॉजी के प्रोफेसर डॉ. विवेक एन. उपाध्याय ने यह जानकारी झील सम्मेलन में अपने प्रजेंटेशन के दौरान दी।

इस पर देश-विदेश के विशेषज्ञों ने कहा कि इन नतीजों के बाद इस दिशा में आगे कार्य किया जा सकेगा, जिससे कई उद्योगों को फायदा होगा। उपाध्याय के अनुसार सांभर झील के अलावा डीडवाणा और पचपद्रा में भी ऐसे कई उपयोगी बेक्टीरिया मौजूद हैं। इन पर शोध किया जाना चाहिए।

अब तक यही माना जाता रहा है कि पानी में नमक की मात्रा 28-30 प्रतिशत बढ़ने के बाद सूक्ष्म से सूक्ष्म बेक्टीरिया का जीवन भी संभव नहीं हो पाता। जबकि उपाध्याय के शोध बताते हैं कि पानी में 30 प्रतिशत तक नमक की मात्रा बढ़ने पर भी ‘नेट्रोनॉ’ और ‘एक्टोथायोरोडोस्पाइरा’ नामक बेक्टीरिया पनप सकते हैं।

उपाध्याय के इन नतीजों के आधार पर झील सम्मेलन में आए देश-विदेश के विशेषज्ञ एजेंडा तैयार करेंगे। इसके बाद राज्य सरकार से सहयोग की अपील करके उनके शोध को आगे बढ़ाया जा सकेगा।

यह है रिसर्च
सांभर झील में बारिश के मौसम में नमक की मात्रा 5 से 7 प्रतिशत रहती है, जो गर्मियों में पानी सूखने पर 30 प्रतिशत तक पहुंच जाती है। इस आधार पर मान लिया गया कि इस पानी में जीवाणु नहीं पनप सकते। उपाध्याय के मुताबिक इस पानी में कई जीवाणु मौजूद रहते हैं।

संसाधनों और फंड की कमी के कारण वे केवल दो बेक्टीरिया के बारे में जानकारी निकाल पाए हैं, लेकिन उनका मानना है कि कुछ और बेक्टीरिया भी इस पानी में जीवित रह सकते हैं। अगर इन जीवाणुओं की विविधता पर कार्य किया जाए तो देश-विदेश को बड़ा फायदा होगा। चीन, अमेरिका और अफ्रीका में भी इन जीवाणुओं पर शोध कार्य जारी है।

सम्मेलन में सत्र की अध्यक्षता कर रहे वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया देहरादून के डॉ. बी.सी. चौधरी ने कहा कि अब तक झीलों की जलीय स्थिति और वनस्पति पर ही शोध होते रहे हैं। खारे पानी की झीलों में ऐसा बहुत कुछ है, जो उद्योगों सहित अन्य लिहाज से भी उपयोगी हो सकता है।

उपाध्याय का यह शोध इसी दिशा में है, जिस पर आगे कार्य होना चाहिए। हंगरी के वैज्ञानिक एरजिबेक ने कहा कि विश्व स्तर पर खारे पानी की झीलों पर शोध कार्य जारी हैं। इस रिपोर्ट के नतीजों के बाद उन्हें बल मिलेगा।





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