सेहत.
आयुर्वेद का सिद्धांत : शरीर के साथ मन को भी रखें निर्मलआपने भूलभूलैया फिल्म देखी होगी। विद्या बालन खुद को मंजुरिका समझती है और राजा सिद्धार्थ को मारना चाहती है। ठीक ऐसे ही होते हैं मानसिक रोगी। अपने आप से अनजान किसी धुन में रमे रहते हैं। दर्द दिमाग में होता है और कहते हैं कि पेट में दर्द है। ऐसे मानसिक रोगियों के रोग को जड़ से खत्म करने में अच्छे-अच्छे चिकित्सकों तक को लंबा समय लग जाता है। कई बार रोग तो दूर हो जाता है लेकिन रोगी की मनोस्थिति स्थिर हो जाती है। आयुर्वेद में मानसिक रोगों का इलाज संभव है। शरीर के साथ-साथ मन भी रोगों का आश्रयस्थल है। ऐसा आयुर्वेद का सिद्धांत है।
आधुनिक जीवन शैली डालती है प्रभाव
आज की भागदौड़ एवं विलासिता पूर्व जीवन शैली जीते हुए मनुष्य कब मानसिक रोगों का शिकार हो जाता है, ऐसा वह स्वयं भी नहीं जान पाता। एक बार मानसिक रोगों की पकड़ में आने के पश्चात आधुनिक चिकित्सा एवं आधुनिक जीवन शैली उसे एक रोग से मुक्ति देती है तो एक रोग उपहार स्वरूप साथ दे जाती है। इसी चक्कर में मानसिक रोगी सारी जिंदगी रंग-बिरंगी गोलियां खाते हुए गुजार देता है। आयु समाप्त हो जाती है परंतु मानसिक रोग आयु र्पयत कभी अधिक कभी कम प्रभाव दिखाते रहते हैं।
रोग कारण
आयुर्वेद में रोगों का द्विविधि वर्णन किया गया है। शारीरिक रोग एवं मानसिक रोग। शारीरिक रोग होने का मुख्य कारण शरीर के तीन दोष वात, पित्त व कफ का असंतुलन होना है। मानसिक रोग होने का मुख्य कारण मन के तीन दोष सत्व, रज व तम का असंतुलन होना है। हमारे शरीर का निर्माण पंचमहाभूत (आकाश, वायु, जल, अगिA, पृथ्वी) और आत्मा व मन तीनों मिलकर जीवन काया का निर्माण करते हैं। मन का मुख्य कार्य बुद्धि एवं पांचों ज्ञान इंद्रियों पर नियंत्रण करना एवं उन्हें शुद्ध मार्ग पर चलाना है। यदि मनुष्य मन पर नियंत्रण न रखे तो इंद्रियां एवं बुद्धि बिगड़ जाती है। सत्व-रज-तम विकास युक्त हो जाते हैं। तमो गुण के कारण तामसिक वृतिया क्रोध, ईष्र्या, अहंकार आदि वृतियां बढ़ जाती है। रजोगुण के कारण राजसी वृतिया जैसे शोक, भय, मोह, लोभ, सुख की अधिक चाह इत्यादि दोष पनपने लगते हैं। मन से सत्व गुण का कम होना, रजो गुण एवं तमो गुण को बढ़ा देता है। जब रजो गुण एवं तमोगुण के लक्ष्य अधिक बढ़ जाते हैं तब यह लक्षण ही मानसिक दोष के रूप में बदल जाते हैं।
क्या हैं लक्षणयदि हम ध्यान दें तो पाएंगे कि मानसिक रोगियों में अत्याधिक क्रोध, बकबकाना, अहंकार स्वरूप स्वयं को कुछ-कुछ समझना एवं निरंतर मोह में पड़े रहकर दुखी रहना। इन लक्षणों के बढ़ने पर व्यक्ति मानसिक रोगों का शिकार हो जाता है।
कैसे होती है चिकित्साआयुर्वेद में दो प्रकार की चिकित्सा की जाती है। संशोधन चिकित्सा एवं संशमन चिकित्सा। संशोधन चिकित्सा के अंतर्गत स्नेहन, संवेदन, वमन, विरंजन चिकित्सा प्रमुख है। स्नेहन चिकित्सा मानसिक दुर्बलता एवं अनिद्रा में लाभकारी सिद्ध हुई है। शिरोवस्ति में पुराने सिरदर्द एवं बुद्धि विभ्रम में काफी लाभ होता है। अभ्यत्र (मालिश) में उदासीनता एवं चिड़िचिड़ापन तथा मनो शिथिलता दूर होती है। संशमन चिकित्सा में औषधियों का प्रयोग किया जाता है। जड़ी बूटियों में मंडूकपर्णी, कुष्माड, शंखपुष्पी, अजरुन, तरुणी, जीवनीयगण में जीवंती, मुदपर्णी, माषपर्णी आदि का प्रयोग योग बनाकर देना भी उपयोगी रहता है।
सत्व गुण बढ़ाना जरूरीमानसिक रोगों की जड़मूल से समाप्ति के लिए औषध के साथ-साथ सत्व गुणों को बढ़ाना भी जरूरी है। सात्विक कर्म एवं वृत्तियों को ग्रहण करने के लिए ज्ञान, ध्यान, धैर्य, समाधि, योग आदि करना जरूरी है। शरीर को स्वस्थ रखने के लिए नियमपूर्वक जिएं तथा शरीर के साथ-साथ मन को भी स्वच्छ एवं निर्मल रखें। शरीर के साथ-साथ मन भी रोगों का आश्रयस्थल है। ऐसा आयुर्वेद का सिद्धांत है।
वह तो मानसिक रोग निकलाहुडा सेक्टर - 12 निवासी मंजू उनके पास आई और कहा कि पेट में दर्द है। वह छह महीने से पेट दर्द का इलाज करवा रही है। उसका दर्द जानने के बाद जब डॉ. मल्होत्रा ने गहन जांच की तो पता लगा कि मंजू को पेट दर्द नहीं मानसिक रोग है। मंजू के दिमाग में यह बात प्रवेश कर गई थी कि उसके पेट में अचानक दर्द हो जाता है। इसी वजह से वह बहुत चिल्लाती। यही नहीं उसकी आंखों से आंसू भी आ जाते थे। इलाज करवाने के लिए उसने कई चिकित्सकों को अपनी समस्या बताई। आखिर में आयुर्वेद व एलोपैथिक से दिमागी भ्रम दूर किया। बाद में उसे बता भी दिया कि उसे पेट दर्द नहीं बल्कि मानसिक रोग था।
आयुर्वेद से दूर हुआ अनिद्रा रोगपानीपत के सुखदेव नगर में रहने वाले राकेश कपूर ने बताया कि उन्हें नींद नहीं आने की शिकायत थी। वे करीब आठ वर्षो से दवाइयांे के माध्यम से आर्टिफिशियल नींद लेते थे। इससे उन्हें सिरदर्द की भी तकलीफ होने लगी। नींद न आने की वजह से उनका जीवन प्रभावित होने लगा। घर के लोग भी काफी परेशान हो गए। इलाज के लिए कई जगह भटके। मगर कोई फर्क न पड़ा। असल में उन्हें मानसिक बीमारी थी। आयुर्वेद से उन्होंने एक महीना इलाज करवाया। उन्हें काफी फर्क महसूस हुआ।
सावधानी भी जरूरीमानसिक रोग को दूर करने के लिए जरूरी है कि लगातार सावधानी बरती जाए। आयुर्वेद से अगर आपको फर्क महसूस होता है तो उसके बाद इलाज कराना एकदम बंद न करें और न ही अपनी पुरानी दिनचर्या को फिर से शुरू करें। इससे रोग जड़ से दूर हो सकता है ।
(जैसाकि उन्होंने रवि धवन को बताया)