अभिमत. इसे भारतीय राजनीति की विडंबना ही कहेंगे कि जब तक पानी सिर से ऊपर न निकल जाए, राजनेता उसकी फिक्र नहीं करते। ग्वालियर से निकली जनादेश यात्रा के दिल्ली पहुंचने के बाद केंद्र सरकार द्वारा राष्ट्रीय भूमि सुधार परिषद का गठन करना कुछ ऐसा ही मामला है। सिंगुर और नंदीग्राम जैसी घटनाएं भी हमारी केंद्रीय सत्ता और राज्य सरकारों की आंख खोलने में नाकाम रहीं।
यह संवेदनहीनता की पराकाष्ठा ही है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह समेत केंद्र सरकार के सभी कर्णधार जनादेश यात्रा के दिल्ली पहुंचने तक सोते रहे और जब यात्रा राजधानी पहुंच गई, तब भूमि सुधार परिषद का गठन कर राजनीतिक कर्तव्य की खानापूर्ति कर ली गई। आखिर सरकार ने परिषद के गठन के लिए अब तक इंतजार क्यों किया? उसने यह कदम पहले ही उठा लिया होता, तो जो फजीहत इस वक्त हो रही है उससे बचा जा सकता था।
यहां यह भी नहीं भूलना चाहिए कि जनादेश यात्रा के तहत दिल्ली पहुंचे 25 हजार पीड़ित-उजड़े लोग तो उन करोड़ों लोगों के प्रतीकात्मक प्रतिनिधि भर हैं, जो पूरे देश में कथित विकास के नाम पर राज्य सरकारों, स्थानीय प्रशासन और बड़े उद्योगपतियों द्वारा उजाड़े गए हैं या उजाड़े जाने की कगार पर हैं। केंद्र और राज्य सरकारें आजादी के बाद छह दशकों में भी भूमि सुधार पूरी तरह से लागू नहीं कर पाईं। उस पर पश्चिम बंगाल सरकार जिस तरह से आंदोलनकारियों से निपट रही है, वह तो और भी शर्मनाक है।
सही है कि जमीन के बगैर विकास और उन्नति संभव नहीं, लेकिन इसके लिए एक तर्कपूर्ण रवैया अपनाए जाने की जरूरत है। पिछले दशकों में खेती की जोतों का औसत आकार भी तेजी से घटा है। सुस्पष्ट नीति न होने से निहित स्वार्थी तत्व गरीब किसानों, आदिवासियों और वंचित तबकों का शोषण करते आ रहे हैं। अभी भी देर नहीं हुई है केंद्र सरकार इस दिशा में उचित कदम उठाए। साथ ही भूमि सुधार को व्यावहारिक स्तर पर अमली जामा पहनाए।