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हिचकें नहीं, इच्छाशक्ति दिखाएं मनमोहन

दृष्टिकोण. भारत-अमेरिका एटमी डील को लेकर देश व देश के बाहर जोरदार बहस चल रही है। जहां यूपीए सरकार को बाहर से समर्थन दे रहे वामपंथी दल इस करार drishtiको विफल बनाने की मुहिम पर जुटे हैं, वहीं दक्षिणपंथी भारतीय जनता पार्टी भी इसके विरोध में है। एटमी करार को लेकर अमेरिकी राजनेताओं की बातें भी सामने आ रही हैं। आमतौर पर अमेरिकी राजनेता इस एटमी करार को भारत-अमेरिका संबंधों को प्रगाढ़ता की दिशा में मील का पत्थर बता रहे हैं।

पिछले हफ्ते यूपीए-वामपंथियों की समिति की बैठक के बाद प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह की करार को आगे न बढ़ा पाने की विवशता खुलकर सामने आई। यह चर्चा भी उड़ी कि वे अपने पद से इस्तीफा देना चाहते हैं। मौका देखकर भाजपा के नेताओं की तीखी प्रतिक्रियाएं आईं। अरुण जेटली ने तो डॉ.सिंह की योग्यता पर सवाल उठाते हुए यहां तक कहा कि एक दुखी और असहाय व्यक्ति देश को कैसे नेतृत्व दे सकता है।

ये वही डॉ. मनमोहन सिंह हैं जिन्हें इतिहास देश के युगांतकारी वित्तमंत्री के रूप में याद रखेगा। उन्होंने 1990 में देश को नई आर्थिक नीतियों और उदारीकरण की प्रक्रिया शुरू करके वैश्विक फलक पर लाकर खड़ा किया। आज उनकी आलोचना करने वाली भाजपा ने अपने शासनकाल में उन्हीं की नीतियों को आगे बढ़ाया। इसे दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि प्रधानमंत्री के रूप में मनमोहन सिंह अवसर गंवा रहे हैं। एटमी करार को अंजाम तक पहुंचाना नई पीढ़ी के लिए उनकी मूल्यवान विरासत हो सकती थी। और अभी भी वे ऐसा कर सकते हैं, बस इसे अमल में लाने का साहस चाहिए। उन्हें राजनीतिक तुष्टीकरण से निकलकर आगे बढ़ना होगा और यदि वे ऐसा नहीं कर पाते, तो उन्हें सम्मान व स्वाभिमान के साथ पद छोड़ देना चाहिए। अपनी विवशता का बयान करना उन्हें शोभा नहीं देता। विरोधियों को देश के मतदाताओं को बताने दीजिए कि आखिर वे आजादी के बाद अब तक के सबसे महत्वपूर्ण समझौते को क्यों खारिज कर रहे हैं।

भाजपा नेताओं को अपने मतदाताओं को सममझाने दीजिए कि वे चीन और पाकिस्तान की मंशा के अनुरूप क्यों व्यवहार कर रहे हैं। इन दोनों पड़ोसी देशों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हो रही भारत की किरकिरी में सबसे ज्यादा आनंद आ रहा है। यह करार तो तत्कालीन भाजपा सरकार द्वारा अमेरिका के साथ शुरू किए गए दोस्ताना रिश्तों का ही उत्कर्ष है। एक समय वह भी याद करिए जब 1971 में भारत-पाक युद्ध के समय अमेरिकी नौसेना का युद्धक बेड़ा बंगाल की खाड़ी में आ गया था। तब अमेरिका के व्यवहार में भारत के प्रति अप्रत्याशित बदलाव की उम्मीद कौन कर सकता था। आज अमेरिका भारत के प्रति क्या दृष्टिकोण रखता है यह अमेरिका के विदेश राज्य मंत्री निकोलस बर्न्‍स के लेख से पता चलता है। उन्होंने लिखा है कि यह करार भारत और अमेरिका के नए रिश्तों की इबारत गढ़ेगा और भारत के प्रति अमेरिका के सम्मान को परिभाषित करेगा।

आज अमेरिका भारत को विश्वमंच पर अपने मित्र के रूप में देखना चाहता है। उसने हर अतंरराष्ट्रीय मुद्दे- चाहे वह दोहा वार्ता हो या फिर क्लाइमेट चेंज निगोसिएशन, हर जगह उसने भारत की बढ़ती ताकत को विनम्रता से स्वीकार किया है। मैंने इस मुद्दे पर अमेरिका, कनाडा, यूरोप, जापान और ऑस्ट्रेलिया के लोगों से बात की, चाहे वे एटमी करार के पक्षवाले हों या विपक्ष वाले, कोई भी इसे भारत को कमजोर या सुभेद्य देश के तौर पर अमेरिका द्वारा उसे अपने प्रभुत्व में लेने की कोशिश के रूप में नहीं देखता। सिर्फ भारत का अस्त-व्यस्त राजनीतिक संसार ही भारत-अमेरिकी रिश्ते को इस नजर से देखता है। भारतीय जनता पार्टी इस यथार्थ को भलीभांति जानती है, पर वह राजनीति के लिए राजनीति कर रही है। जहां तक वामपंथियों का सवाल है, तो जाहिर है कि अमेरिका विरोध उनकी नीति और सिद्धांतों का हिस्सा है।

आज अमेरिका में भारत के पक्ष में वातावरण बना हुआ है। संभव है कि कल ऐसा न हो। वहां की संभावित राजनीतिक परिस्थितियां भारत के खिलाफ भी जा सकती हैं। इसलिए यह आवश्यक है कि सभी बाधाएं जितनी जल्दी हो सके दूर करके अंतिम मसौदा इसी साल के अंत तक अमेरिकी कांग्रेस के सामने प्रस्तुत करने की स्थिति में आ जाए। वरना चुनावी साल में कोई भी प्रशासन इस विवादास्पद करार को कांग्रेस के सामने प्रस्तुत करने का जोखिम नहीं मोल लेगा। वैसे भी डेमोक्रेटों को यह करार नहीं सुहा रहा है। वे परमाणु अप्रसार का मुद्दा उठाकर इस करार को पूरी तरह खारिज भी कर सकते हैं।

भारत जिसने अभी परमाणु अप्रसार संधि में हस्ताक्षर नहीं किए हैं, 1998 में परमाणु परीक्षण के बाद से प्रतिबंध झेल रहा है और विश्व की परमाणु बिरादरी से अलग-थलग है। अमेरिका भारत को एक जिम्मेदार राष्ट्र मानता है क्योंकि उसे इस बात का भरोसा है कि भारत परमाणु संसाधनों का दुरुपयोग नहीं करेगा। दुनिया की परमाणु बिरादरी में शामिल होने के बाद परमाणु अप्रसार के प्रयासों में भारत मददगार ही साबित होगा। एक प्रभावी आर्थिक और सैन्य शक्ति होने के नाते भारत दुनिया में शक्ति संतुलन बनाने में भी अपनी प्रभावी भूमिका का निर्वाह कर सकता है।

क्या हम अपने हित की बातों को इसलिए खारिज कर देंगे क्योंकि इसे अमेरिका समर्थन दे रहा है? निकोलस बर्न्‍स कहते हैं कि अमेरिका व भारत की मित्रता कई मामलों में असहमतियों के बावजूद हो सकती है। इससे यह समझा जा सकता है कि अमेरिका अपना प्रभुत्व जमाने के लिए भारत को एक ग्राहक राष्ट्र के नजरिए से नहीं देखता। यह सही है कि हर कोई इस करार के तकनीकी पेंच नहीं समझ सकता, लेकिन यदि देश के निष्पक्ष और सम्मानित वैज्ञानिक इस करार से संतुष्ट हैं तो यह पर्याप्त है। यदि वे संतुष्ट नहीं हैं तो फिर इस करार को रद्दी की टोकरी में डाल देने में कोई हर्ज नहीं है।

मेरी दृष्टि से कूटनीतिक व राजनीतिक दोनों ही संदर्भो में यह करार भारत के लिए फायदे का सौदा है। राजनीतिक दृष्टि से प्रधानमंत्री को इस मामले में संकोच करने की कोई जरूरत नहीं है। मनमोहन सिंह या तो इस करार को अंतिम मुकाम तक पहुंचाने के लिए अपने सहयोगी राजनीतिक दलों पर दबाव बनाएं या फिर इस्तीफा दे दें। अब यही एक रास्ता है।

-लेखक कनाडा की वाटरलू यूनीवर्सिटी में राजनीति विज्ञान के प्रोफेसर हैं।





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