सम्पादकीय. भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर वाईवी रेड्डी के बारे में कहा जा रहा है कि वे एक कठिन दौर में देश का मौद्रिक प्रबंधन कर रहे हैं। कठिन इसलिए कि एक तरफ देश की अर्थव्यवस्था सरपट भागना चाहती है, विदेशी मुद्रा का प्रवाह फैन उगलता चला आ रहा है, कंपनियों के मुनाफे अच्छे-खासे हैं और दूसरी तरफ रुपए की मजबूती निर्यातकों के मुनाफे कम कर रही है, ऊंची ब्याज दरें वाहन, मैन्युफैक्चरिंग व कंज्यूमर गुड्स उद्योग की हालत बिगाड़ रही हैं।
इसमें कुछ भी चौंकाने वाला तत्व नहीं है कि रिजर्व बैंक ने मौद्रिक नीति की 2007-08 की छमाही समीक्षा में साख जमा अनुपात (सीआरआर) आधा फीसदी इजाफे के बाद 7.5 फीसदी कर दिया है। साल के शुरू में यह 5.25 फीसदी चल रहा था। आज मुद्रास्फीति अगर 3 फीसदी के आसपास चल रही है, तो इसमें सीआरआर और ब्याज दरों में इजाफे का बड़ा हाथ है लेकिन रिजर्व बैंक के गवर्नर का काम मुद्रास्फीति पर काबू रखना ही नहीं है, उसे यह ख्याल भी रखना है कि रुपए की मजबूती एक सीमा में रहे और विकास की गति 8.5-9 फीसदी रहे।
सीआरआर में इजाफे से बैंकिंग प्रणाली से करीब 15 हजार करोड़ रुपए बाहर करने में सफलता जरूर मिलेगी लेकिन सारा दारोमदार इस बात पर है कि अमेरिकी फेड रिजर्व ब्याज दरें घटाता है या नहीं। खुद रेड्डी ने भी रेखांकित किया है कि भविष्य में तरलता उनकी बड़ी चिंता है लेकिन मुद्रास्फीति के बाहरी दबाव बनेंगे और सरकार को बजट के लक्ष्य हासिल करने के लिए वित्त वर्ष के बाकी समय खर्च पर नियंत्रण करना होगा। रिजर्व बैंक ने रेपो या रिजर्व रेपो को हाथ नहीं लगाया है क्योंकि वह वित्तीय स्थिरता के संकेत देना चाहता है। भुगतान संतुलन की स्थिति बेहतर है और राजकोषीय घाटा नियंत्रण में है। बीते एक साल में 19 अक्टूबर तक विदेशी निवेशक (एफआईआई) 21.2 अरब डॉलर भारत लाए हैं जबकि आउटफ्लो केवल 93.3 करोड़ डॉलर का रहा है।
रिजर्व बैंक को संतुलन कायम करना है तो डॉलर का आउटफ्लो बढ़ाने के उपाय करने होंगे, वहीं रुपए को मजबूती से बचाने के लिए मार्केट स्टेबलाइजेशन स्कीम (एमएसएस) और लिक्विडिटी एडजस्टमेंट फेसिलिटी (एलएएफ) जैसे उपायों का सहारा लेना होगा। रिजर्व बैंक भविष्य में सीआरआर में और वृद्धि करता दिखाई देगा। बैंकों की समस्या यह है कि उन्हें कर्ज की दर बढ़ाने के लिए ब्याज दरों में कमी करनी होगी। दूसरी तरफ डिपाजिट की दरें बढ़ानी होंगी।