न्यूयॉर्क. यह किसी साईफाई फिल्म की कहानी सी लगती है, लेकिन नहीं। दरअसल अनदेखे प्राणियों की सेनाएं इस ग्रह पर तेजी से फैल रही हैं, जो नादान बच्चों को अपनी चपेट में ले रही हैं। इनकी प्रतिरोधक क्षमता दुनिया में किसी भी तरह की बीमारीरोधक दवाओं से ज्यादा है।
इन खतरनाक सूक्ष्म प्राणियों को सुपरबग कहा जा रहा है। यूएस के कई स्कूलों के बच्चे हाल ही में एमआरएसए बैक्टीरिया के इन्फैक्शन की चपेट में आकर मौत के शिकार हो गए। मैथिसिलिन प्रतिरोधक इस बैक्टीरिया को स्टेफाइलोकॉकस ऑरियस के नाम से जाना जाता है। इनके शिकार लोगों की तादाद हर साल बढ़ रही है।
एमआरएसए सतह से सतह के संपर्क में आकर फैलता है और अगर परिस्थितियां अनुकूल रहें तो इन्फैक्शन तेजी से फैलता है। इसके पहले लक्षण हैं- त्वचा पर फुंसी निकलना। इसका मतलब है कि बैक्टीरिया का हमला हो चुका है। इसके साथ ही काफी तेजी के साथ इन्फैक्शन व्यक्ति के शरीर में प्रवेश कर जाता है और शरीर के विभिन्न अंगों पर हमला कर देता है, जिसके बाद व्यक्ति की मौत हो जाती है। हालांकि मेडिकल एक्सपर्ट्स कहते हैं कि सुपरबग्स जैसी चीजें धीरे-धीरे सारी दुनिया में फैल रही हैं लेकिन इन इलाकों के लोगों को चिंता करने के अलावा सभी को चिंतित होने की जरूरत नहीं है।
आंकड़ों में मौत का सच
2005 में एमआरएसए के इन्फैक्शन का शिकार होकर 18650 अमेरिकियों की मौत हो गई। मैसाचुसेट्स जनरल हॉस्पिटल के डॉ सायरस हॉपकिंस का कहना है कि एमआरएसए जैसे इन्फैक्शन हमारे समाज में करीब 50 साल से हैं। ये कोई नई बीमारियां नहीं हैं। 2005 में हुई मौतों में से 77 फीसदी 65 या उससे ज्यादा उम्र के लोगों की थीं। हॉपकिंस का कहना है कि एक सुपरबग के संपर्क में आने की आशंका काफी कम होती है। हॉपकिंस राहत देते हैं कि अगर आप सुपरबग के संपर्क में आ भी जाएं तो उससे बीमार होने की गुंजाइश काफी कम है और अगर बीमार भी हुए तो मरेंगे नहीं। क्योंकि हमारे शरीर की प्रतिरोधक क्षमता किसी भी खतरनाक बैक्टीरिया से लड़ने में सक्षम है। इसके अलावा दोस्त बैक्टीरिया बड़ी तादाद में हमारे शरीर में होते हैं, जो बाहर से आने वाले हर हमले को झेलने को तैयार रहते हैं। उनके मुताबिक 25 से 30 फीसदी लोगों की नाक में ही फायदेमंद बैक्टीरिया एस ऑरियस का एक नेचुरल फ्लोरा होता है।
क्या है दवा
लेकिन हमारे शरीर की प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करने वाले कौन से एंटीबायोटिक हैं, जो इन बाहरी हमलों से लड़ सकें? न्यूयॉर्क के यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ मेडिसिन के प्रोफेसर और इन्फैक्शियस डिजीज सोसायटी ऑफ अमेरिका के पूर्व अध्यक्ष डॉ. मार्टिन ब्लेजर का कहना है कि हर बार जब कोई नया एंटीबायोटिक मार्केट में आता है तो वह कुछ साल के लिए ठीक काम करता है। इसके अलावा जैसे ही कोई एंटीबायोटिक लेना शुरू करता है, एमआरएसए जैसे बैक्टीरिया भागना शुरू हो जाते हैं। उनका कहना है कि जब तक कंपनियां नए-नए एंटीबायोटिक तैयार करती रहेंगी हम ऐसी बीमारियों से लड़ सकते हैं। लेकिन चूकि यह काफी खर्चीला है, इसलिए कंपनियां इधर कम ही ध्यान देती हैं।
ब्लेजर के मुताबिक जो लोग एमआरएसए के शिकार हुए वे अक्सर अलग-थलग इलाकों में रहते थे और जब उन पर सुपरबग का हमला हुआ तो वे ज्यादा दूर नहीं जा सके। लेकिन आज लोग काफी आसपास रहते हैं और उनमें बुजुर्गो की तादाद भी काफी है। दूसरी ओर उनमें एचआईवी कैरियर भी हैं। और इन सब को देखें तो सुपरबग्स के हमले के लिए पूरी जमीन तैयार है।
चैंबर से इन्फैक्शन का पता
यूनिवर्सिटी ऑफ ब्रैडफोर्ड, यूके में मेडिकल टैक्नोलॉजी प्रोफेसर इंजीनियर क्लाइव बैग्स ने ऐसे चैंबर तैयार किए हैं, जिनसे अस्पतालों में संक्रामक रोगों का पता लगाया जा सकता है। 2825 क्यूबिक फुट का यह रूम देखने में एक हॉस्पिटल का वार्ड लगता है। बैग्स इन दिनों यूरोप के अस्पतालों में फैल रहे दवारोधी माइक्रोब क्लॉस्ट्रीडियम डिफिसाइल के व्यवहार का पता लगाने में जुटे हैं।
सुपरबग्स को रोकने की तैयारी
बैग्स जैसे लोग जहां खतरनाक माइक्रोब्स से निपटने के लिए अपने ढंग से जुटे हैं वहीं दूसरे नए एंटीबायोटिक्स की मांग कर रहे हैं। लेकिन कुछ एक्सपर्ट्स ऐसे भी हैं जिनका मानना है कि सुपरबग्स से लड़ने के लिए पुराने हथियार वैक्सीन्स से बेहतर कुछ नहीं। लेकिन सेंट लुई यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ मेडिसिन के डॉ डोनाल्ड कैनेडी कहते हैं कि तब तक कोई वैक्सीन में पैसा नहीं लगाएगा जब तक कि वह जबर्दस्त ढंग से फैली हुई बीमारी न हो। हालांकि उन्हें भी लगता है कि एमआरएसए का इलाज यही है।