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सियासी गलियों में खूब चले हैं पटाखे

ज्यों-ज्यों दिवाली करीब आ रही है, गठबंधनी सियासत की गलियों में पटाखेबाजी तेज होती जा रही हैं। तीन साल की बच्चा सरकार को हर कोई 'क्या पिद्दी क्या पिद्दी का शोरबा' धूमधड़ाके से डराने की कोशिश कर रहा है। कुछ वाम से बम दाग रहे हैं, तो कुछ दाम मांग रहे हैं समर्थन का। कुछ कलकतिया यह कहकर पलीते में आग लगा रहे हैं कि बम दगनेवाला है, लोग-बाग कान में उंगली देकर दम साध लेते हैं लेकिन आवाज फुस्स की आती है, इस पर वे खीसें निपोर कर सफाई देते हैं, हम तो पटाखे चेक कर रहे थे, ठिठोली ऐसी गोया दिवाली नहीं होली हो।

वामदलों की ताजा हरकत पर गौर करें तो वो उनके पुरातन इतिहास के अनुरूप ही है। पलीता लगाना हो, तो वे दीवाली का इंतजार नहीं करते। ये दीगर है कि किसी की दीवाली काली करने में उनका खुद का दीवाला निकला जा रहा है।

मोदी में दम है
उधर मोदी के मोदक कड़वे करने को भी कुछ भाई तहलका मचा रहे हैं। सियासी लीला में मोदी के चुनावी वध का आह्वान हो रहा है, एक तरफ रावण सेना है तो दूसरी तरफ लंगूरों की। मोदी अट्टाहस कर रहे हैं, है कोई माई का लाल। कौन धंस सकता है उनकी लंका में। कौन विधर्मी तोड़ सकता है, लाशों के बनाए उनके तोरण द्वार।हे राम
दीवाली आते-आते करुणानिधि राम का एक और स्वरूप सामने आया। (सौजन्य से के. करुणानिधि) ताजा शोध है कि अगर वे कहीं थे भी, तो शराबी ही थे। भक्तों को भला कहां ये बर्दाश्त होने वाला था। तू शराबी-तेरा बाप शराबी के अंदाज में तूतू-मैंमैं शुरू हो गई। कबीर ने ऐसे ही लोगों के लिए कहा है-दोनऊ राह न पाई। ऐसे में राम होते भी तो अपने को खारिज कर देते। हे राम इन्हें सद्बुद्धि देना।

हैप्पी दिवाली
दीवाली तीन मौकों के लिए याद रहती है, पहली रामचंद्र की घर वापसी, दूसरी बोनस और सबसे महत्वपूर्ण गिफ्ट के पैक में घूस के कारण। अगर तीसरा कारण न रहे तो हर बड़े आदमी की दीवाली काली।

हम लोग बचपन में दीवाली पर स्कूलों में निबंध लिखते आए हैं। तब रामायण जैसे सीरियल नहीं थे। गली-गली रामलीलाएं थीं। उन्हीं में जो देखते थे और बड़े-बुजुर्गों से सुनते थे, वही उत्तरपुस्तिकाओं में लिख आते थे। अब सोचिए कि किसी आला अफसर की औलाद को दीवाली पर ऐसे लिखने को कहा जाए, तो वो क्या लिखेगा..मार्केट, स्वीट्स, चाकलेट, गिफ्ट, क्रैकर्स, न्यू ड्रैस, म्यूजिक, डांस..और रामचंद्र.हू इज दिस गाय रामचंद्र





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