दृष्टिकोण. देश के लाखों घरों में भूख पसरी हुई है। यह भूख न तो किसी को नजर आती है और न कोई इस पर नजर डालना ही चाहता है। यह भूख दूर-दराज के अंधेरे गांवों में भी पसरी है और जगमगाते शहरों में भी। देश के लाखों लोगों के लिए भूख उनकी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा है। वे न तो इसे लेकर गिले-शिकवे करते हैं और न ही पछताते हैं। कुछ अध्ययनों के मुताबिक देश में आठ करोड़ से 20 करोड़ तक स्त्री-पुरुष और बच्चे रोजाना भूखे पेट सोते हैं। जब हम अपनी वैज्ञानिक खोजों पर इतरा रहे होते हैं तब बहुतेरे आदिवासी और ग्रामीण समुदाय खामोशी के साथ अपना अस्तित्व बचाने के उपाय तलाश रहे होते हैं। पहाड़ी, रेतीली और दूसरी अनुपजाऊ जमीन पर उगने वाली झाड़ियां, खरपतवार और कंद ही अक्सर उनके भोजन का हिस्सा होते हैं। इनमें कोई पोषक तत्व भले ही न हों मगर इनसे उनके पेट की आग जरूर बुझ जाती है।
जब घर में अनाज का एक दाना भी नहीं होता और कोई काम भी नहीं होता, तब भूख की मारी औरतें और बच्चे खाने की तलाश में इधर-उधर भटकते फिरते हैं। फसल काटे जाने के बाद खेत में बचे रह गए अनाज के दाने और गली-बाजार में पड़ी सड़ी-गली सब्जियां बटोरकर वे किसी तरह अपनी भूख मिटाने का जतन करते हैं। सबसे गई-गुजरी हालत में रहने वाले बिहार की मुसहर जाति के लोग तो गाय-भैंसों के गोबर और चूहों के बिलों तक से अनाज के दाने बीनते हैं। ये लोग खाने-पीने का जो सामान जुटाते हैं वह अक्सर उनकी भूख मिटाने के लिए काफी नहीं होता। ऐसे में वे इस सामग्री को एक बड़े बरतन में ज्यादा-सा पानी भरकर और ढेर सारा नमक-मिर्च डालकर उबालते-पकाते हैं ताकि वह देखने में ज्यादा नजर आए। परिवार के सदस्यों में इस भोजन के बंटवारे में भी भेदभाव बरता जाता है। सबसे बड़ा और पहला हिस्सा परिवार के मुखिया पुरुष को मिलता है। फिर बच्चों और बूढ़ों की बारी आती है और सबसे आखिर में औरतों और कभी-कभी लड़कियों का नंबर आता है। भूख के शिकार परिवारों में भी सबसे ज्यादा त्याग स्त्रियों को ही करना पड़ता है। भूखे पेट सोना एक तरह से उनकी नियति होती है।
यह भूख अक्सर परिवार के संबंधों पर असहनीय बोझ बन जाती है। देश के तमाम शहर गांवों से आने वाले ऐसे पुरुषों से अटे पड़े हैं जो रिक्शा चलाकर, पत्थर तोड़कर, इमारतें बनाकर और सामान ढोकर गुजारा करते हैं और बहुधा सड़कों के किनारे ही नींद पूरी करते हैं। वे बेहद अकेले रहते हैं, हाड़-तोड़ मेहनत करके भी बहुत कम मजदूरी पाते हैं और इसमें से भी ज्यादा से ज्यादा बचत करने के लिए सड़कों के किनारे या झुग्गियों में गुजर करते हैं। वे ऐसा इसलिए करते हैं कि गांवों में छूट गए परिजनों को भूख से बचाने के लिए कुछ पैसे जोड़ सकें। वे जानते हैं कि यदि वे अपनी मेहनत की कमाई अपने रहने-खाने पर खर्च कर देंगे तो गांव में छूट गए उनके परिजनों को भूखे रहना पड़ेगा। कभी-कभार गांवों से पलायन करने वाले परिवार बच्चों को भी साथ ले जाते हैं। ऐसे में वे परिवार के बूढ़ों-बुढ़ियों को गांव में ही असहाय छोड़ जाते हैं और ये बूढ़े-बुढ़िया या तो अपने प्रयासों से गुजर-बसर करते हैं या फिर गुमनाम मौत का इंतजार करते हैं। उनकी मौत पर न कोई ध्यान देता और न कोई शोक मनाता है। ऐसे परित्यक्त बूढ़े-बुढ़िया अक्सर गांव में भीख मांगते देखे जा सकते हैं। ये लोग जीवन की हारी हुई लड़ाई लड़ रहे होते हैं जिसका एक ही अंत होता है-गुमनाम और खामोश मौत।
भूख के कारण परिवार और तरीकों से भी बिखरते हैं। छत्तीसगढ़ या उड़ीसा के अकालग्रस्त इलाकों में मां-बाप द्वारा बच्चों को नाममात्र की कीमत में बेचे जाने की खबरें अक्सर मीडिया में आती हैं। ऐसे ज्यादातर मामलों में मां-बाप की मंशा यही होती है कि बच्चे को ठीक-ठाक आश्रय मिल सके। घरों से भागे हुए बहुतेरे बच्चे मानते हैं कि उन्होंने घर मां-बाप द्वारा प्रताड़ित करने की वजह से नहीं बल्कि इसलिए छोड़ा कि वहां सभी के लिए खाने का पर्याप्त सामान नहीं था। ऐसे बच्चे यह भी कहते हैं कि उनके घर छोड़ने से एक खाने वाला कम हो गया है और उनके छोटे भाई-बहनों के हिस्से में ज्यादा खाना आएगा। ऐसे बच्चों में कुछ तो सात बरस की मासूम उम्र में ही घर छोड़ देते हैं।
यह भूख ही होती है जो छोटे-छोटे बच्चों को फैक्टरियों और खाने-पीने की दुकानों में काम करने को मजबूर करती है। भूख के मारे बच्चे धर्मस्थलों के आसपास या सड़कों पर भीख मांगते देखे जा सकते हैं। थोड़ा बड़े होने पर यही बच्चे कचरा बीनने, पानी बेचने या फिर रेलगाड़ियों के डिब्बों में झाड़ू लगाने जैसे काम करने लगते हैं। इनमें से कुछ यौन शोषण के भी शिकार हो जाते हैं और पैसे व भोजन के लिए शरीर तक बेचने लगते हैं।
कुछ मां-बाप अपने बच्चों को घरों, ढाबों या चाय बागानों में काम करने भेज देते हैं। ग्रामीण इलाकों में भूखे लोगों के लिए बंधुआ मजदूर बनने या फिर कर्ज लेकर गुजारा करने के विकल्प तो होते हैं पर ये विकल्प बेहद क्रूर होते हैं। वहां जरूरतमंदों को कर्ज देने वाले सूदखोर की कभी कमी नहीं रहती मगर वे पांच फीसदी मासिक से भी ज्यादा दर से चक्रवृद्धि ब्याज वसूलते हैं। जिन भूखे लोगों के पास गिरवी रखने के लिए कोई जमीन नहीं होती, वे अपने शरीर को ही गिरवी रख देते हैं। सालों पहले गैर-कानूनी करार दी जा चुकी बंधुआ मजदूरी की प्रथा बहुत से इलाकों में अभी भी बदस्तूर जारी है। मैंने ऐसे व्यक्ति भी देखे हैं जो 40 साल से भी ज्यादा समय तक बंधुआ मजदूरी कर चुके हैं। कुछ परिवार तो पीढ़ी-दर-पीढ़ी बंधुआ मजदूरी करते हुए गुजार देते हैं।
भूख के शिकार कुछ परिवार सालाना आधार पर बंधुआ मजदूरी करते हैं। वे कुछ रुपयों की खातिर पूरे परिवार के साथ ईंट-भट्ठों, पत्थर खदानों और निर्माण स्थलों पर काम करते हैं। इन परिवारों के बड़े बच्चे मां-बाप के साथ ही खटते हैं और छोटे बच्चे अपने से छोटों की देखभाल करते हैं। ये नन्हे बच्चे प्राय: मां के दूध से भी वंचित रहते हैं क्योंकि वे काम के बीच से बच्चों को दूध पिलाने नहीं आ सकतीं।
हाल के वर्षो में कृषि क्षेत्र में संकट बढ़ने से बहुत से किसान भी खुदकुशी का रास्ता अख्तियार कर रहे हैं। किसानों द्वारा बड़ी संख्या में खुदकुशी इसी भूख का नतीजा है। भूखे पेट जीने की कवायद में अंतत: हार मानने वालों की संख्या दिनोंदिन बढ़ती जा रही है।