सम्पादकीय. कोयंबटूर बम धमाकों के मामले में फैसला सुनाते वक्त विशेष जज के उथिरापति द्वारा की गई टिप्पणी देश में न्याय के पहरुओं की आंखें खोल देने वाली है। कानून बनाने और उनके पालन के लिए जिम्मेदार दोनों ही लोगों के लिए जरूरी है कि वे विशेष जज की टिप्पणी के निहितार्थ समझें। यह टिप्पणी जिस समय आई है उसे देखते हुए ऐसा करना और भी जरूरी है। उथिरापति ने ‘मुसलमानों के एक बड़े वर्ग का न्यायिक व्यवस्था से भरोसा उठ गया है’ जैसी क्षोभ भरी टिप्पणी तब की है जब गुजरात में 2002 में हुए दंगों के वीभत्स मंजर और उसके जिम्मेदार लोगों को बेनकाब करते स्टिंग ऑपरेशन की धमक फिजाओं में गूंज रही है।
1998 में लालकृष्ण आडवाणी की कोयंबटूर यात्रा के दौरान बम धमाके हुए थे। इन धमाकों को कुछ ही दिन पूर्व हुई हिंसा और उसमें मारे गए 18 मुसलमानों से सीधे तौर पर जोड़कर देखा गया था। कुछ लोगों ने इन धमाकों को 1992 में हुए बाबरी मस्जिद विध्वंस से भी जोड़कर देखा। ऐसे में विशेष जज ने फैसला सुनाते हुए कहा, ‘इस मामले में दोषियों को फांसी की सजा न सुना पाने के पीछे राज्य मशीनरी की विफलता भी एक कारण रही.. किसी दूसरे संप्रदाय के साथ की गई जोर-जबरदस्ती या निषेध तौर-तरीकों की आजमाइश की प्रतिक्रियास्वरूप जो घटनाएं होती हैं वे समाज को दहलाकर रख देती हैं।’
इससे पहले गोधरा की एक अदालत ने 2002 में एराल गांव में हुई हिंसा के तहत बलात्कार और फिर सात लोगों की हत्या में भारतीय जनता पार्टी से जुड़े दो लोगों समेत आठ को उम्रकैद की सजा सुनाई थी। उस हिंसा के बचे-खुचे भुक्तभोगियों और उनके परिवार वालों को लगा कि उनके साथ न्याय नहीं हुआ है। कारण सुबूतों के अभाव में 29 आरोपियों को अदालत ने बरी कर दिया था।
स्वतंत्र भारत के इतिहास में अब तक हुए ज्यादातर सांप्रदायिक दंगों की यही कहानी रही है। भले ही वह 1984 के सिख विरोधी दंगे रहे हों या फिर 1992-93 के मुंबई दंगे या फिर 2002 के गुजरात दंगे। इन सभी दंगों में सुबूतों के अभाव में आरोपी रिहा हुए और भुक्तभोगी समुचित न्याय न मिलने का रोना रोते रहे। इन सभी मामलों में जो एक प्रश्न बार-बार उठकर सामने आता है वह यह कि आखिर क्यों भारत के सभी नागरिक एक समान नजर से नहीं देखे जाते। या तो उन्हें धर्म के चश्मे से देखा जाता है या फिर किसी खास राजनीतिक पार्टी के नुमाइंदों के तौर पर।
जब कभी भी धर्म या राजनीतिक सत्ता की भागीदारी होगी, विशेषकर बड़े पैमाने पर होने वाली हिंसा में, तब-तब सच्चई से मुंह मोड़ने की कोशिशें की जाती रहेंगी। हर बार यही जुमला उछाला जाता है कि जब सब कुछ सामान्य हो चुका है, फिर पुराने घावों को कुरेदने का क्या फायदा। ऐसे में कोयंबटूर मामले में फैसला सुनाते वक्त विशेष जज की तीखी टिप्पणी स्पष्ट संकेत देती है कि न्याय की प्रक्रिया में तेजी लाते हुए उसे भरोसेमंद बनाने की जरूरत है।