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जोधपुर. भाई की कथित हत्या की रिपोर्ट देने के बावजूद एफआईआर दर्ज नहीं करने के मामले में हाईकोर्ट ने नाराजगी जाहिर करते हुए बीकानेर के पुलिस
महानिरीक्षक लक्ष्मण मीणा को 5 नवंबर को न्यायालय में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने का आदेश दिया है।
न्यायाधीश गोपालकृष्ण व्यास ने यह आदेश संतलाल की ओर से दायर रिवीजन याचिका में दिए हैं। कोर्ट ने एफआईआर के लिए दी गई रिपोर्ट में स्पष्ट आरोप लगाने के बावजूद एफआईआर दर्ज नहीं कर आत्महत्या का मामला मानते हुए पुलिस की ओर से मर्ग की कार्रवाई करने को दुर्भाग्यपूर्ण बताया।
न्यायालय ने कहा कि प्रत्येक नागरिक को एफआईआर दर्ज करवाने का अधिकार है और पुलिस का यह दायित्व है कि वह मामला दर्ज कर जांच करे।
क्या था मामला
संतलाल ने याचिका पेश कर कहा कि उनके पुत्र कमलेश की मृत्यु हो जाने पर उसके दूसरे पुत्र ताराचंद व चाचा ने पुलिस उप अधीक्षक सूरतगढ़ को रिपोर्ट पेश की, जिसे एफआईआर दर्ज करने के लिए पुलिस थाना राजियासर को भेजा गया। इसके बावजूद एफआईआर दर्ज नहीं हुई तो अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के न्यायालय में इस्तगासा पेश करना पड़ा। याचिका में कहा गया कि पुलिस आरोपियों के दबाव में मामला दर्ज नहीं कर आत्महत्या का मामला मानते हुए मर्ग की कार्रवाई कर रही है।
जोधपुर आईजी ने अदालत के समक्ष खेद जताया
जोधपुर: राजस्थान हाईकोर्ट के आदेश के बाद आईजी एनआरके रेड्डी ने गुरुवार को अपर सेशन जज की अदालत में हाजिर होकर श्यामलाल हत्याकांड के बहुचर्चित
मामले में गैरजिम्मेदाराना अनुसंधान करने वाले दोषी पुलिसकर्मियों के खिलाफ की गई कार्रवाई रिपोर्ट पेश की। कोर्ट के आदेश के पांच महीने बाद भी दोषी पुलिसकर्मियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं करने पर आईजी ने खेद जताया।
बहुचर्चित इस मामले में फास्ट ट्रैक कोर्ट के तत्कालीन न्यायाधीश कमल कुमार बागड़ी ने इसी साल 9 मई को फैसला सुनाते हुए आईजी को वृत्ताधिकारी ग्रामीण तत्कालीन डिप्टी एसपी प्रतापसिंह, महामंदिर थानाधिकारी कानसिंह व लूणी थानाधिकारी सुरजाराम के खिलाफ कठोर अनुशासनात्मक कार्रवाई कर रिपोर्ट कोर्ट में पेश करने का आदेश दिया था। इस फैसले के पांच महीने बाद भी आईजी ने कोर्ट के आदेश की पालना नहीं की। न्यायाधीश बागड़ी ने इस मामले में तीन अभियुक्तों को उम्र कैद की सजा सुनाई लेकिन पुलिस के गैर जिम्मेदाराना अनुसंधान से चार सह आरोपी बरी हो गए थे।
हाईकोर्ट ने जताई गहरी नाराजगी
श्यामलाल हत्याकांड के अभियुक्तों की ओर से इस मामले में हाईकोर्ट में अपील पेश की गई थी। इस पर हाईकोर्ट को जानकारी हुई कि निचली अदालत के आदेश की पालना नहीं की गई है। न्यायाधीश भगवती प्रसाद व न्यायाधीश डीएन थानवी की खंडपीठ ने इस पर गहरी नाराजगी जताते हुए पुलिस आईजी को 25 अक्टूबर को होईकार्ट में व्यक्तिगत रूप से हाजिर होने का आदेश दिया। इसके बावजूद वे हाईकोर्ट में हाजिर नहीं हुए। इस पर खंडपीठ ने आईजी को निर्देश दिया कि पालना रिपोर्ट के साथ वे एक नवंबर को फास्ट ट्रेक कोर्ट में व्यक्तिगत रूप से हाजिर रहें। इस आदेश की पालना में आईजी एनआरके रेड्डी ने अपर सेशन न्यायाधीश ओमप्रकाश गुप्ता की अदालत में हाजिर होकर पालना रिपोर्ट पेश की।
बैक डेट में की कार्रवाई?
खंडपीठ ने पिछले महीने 24 अक्टूबर को आईजी को कोर्ट में व्यक्तिगत रूप से हाजिर होकर रिपोर्ट पेश करने के निर्देश दिए थे। आईजी की रिपोर्ट के मुताबिक दोषी पुलिसकर्मियों के खिलाफ 23 अक्टूबर को अनुशासनात्मक कार्रवाई की गई। यह कार्यवाही इसलिए संदेहास्पद हो जाती है कि निचली अदालत के आदेश की करीब पांच महीने तक पालना नहीं की गई। वहीं कार्यवाही हाईकोर्ट के आदेश के ठीक एक दिन पहले क्यों और कैसे हो गई?
केवल स्पष्टीकरण मांगा
न्यायाधीश बागड़ी ने इस मामले में दोषी पुलिसकर्मियों के खिलाफ तल्ख टिप्पणी करते हुए फैसले में कहा था कि ‘पुलिस ने अपने कर्तव्य के प्रति लापरवाही बरतते हुए कार्य किया है, इसलिए आईजीपी रेंज जोधपुर को इस निर्णय की प्रति भेज कर लिखा जाए कि इन तीनों पुलिस अधिकारियों के विरुद्ध कठोर अनुशासनात्मक कार्यवाही की जाए’ इसके बावजूद आईजी ने तत्कालीन वृत्ताधिकारी प्रतापसिंह से मात्र स्पष्टीकरण ही मांगा है।
आईजी ने वृत्ताधिकारी से 23 अक्टूबर को सात दिन में स्पष्टीकरण देने के लिए कहा था। इसके बावजूद वृत्ताधिकारी ने आज दिन तक कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया है। इस बात का खुलासा स्वयं आईजी ने अपनी रिपोर्ट में किया है। इस कार्यवाही के तहत आईजी रेड्डी ने तत्कालीन एसएचओ कानसिंह व सुरजाराम को चार्जशीट थमाते हुए 17 सीसीए की विभागीय कार्रवाई शुरू की है।