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ब्यावरा. आजाद भारत में स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की फजीहत हो रही है। इसमें मप्र पाठच्यपुस्तक निगम भी पीछे नहीं है। निगम द्वारा प्रकाशित कक्षा पांच की हिंदी भाषा की किताब में ब्यावरा के जी श्याम भरथरे का तो नाम तक नहीं है,जो गोवा मुक्ति आंदोलन में १५ अगस्त १९५५ को पुर्तगालियों की गोली से शहीद हुए थे, लेकिन उनके जीवित पुत्र बालकृष्ण भरथरे को शहीद बना दिया है।
नई पीढ़ी को देश के शहीदों के बारे में जानकारी देने के लिए मप्र पाठच्यपुस्तक निगम ने कक्षा पांच की हिंदी भाषा भारती किताब में ‘मरकर भी जो अमर हैं’ शीर्षक से पाठ १२ रखा है। इसी पाठ में गोवा मुक्ति आंदोलन मे पुर्तगालियों की गोलियों का शिकार हुए ब्यावरा के अमर शहीद जी श्याम भरथरे की जगह उनके जिंदा पुत्र बालकृष्ण भरथरे का नाम छाप दिया गया है । पुस्तक में स्पष्ट लिखा हुआ है कि ब्यावरा के बालकृष्ण भरथरे भी शहीद हुए हैं।
बालकृष्ण भरथरे ने भास्कर को बताया कि वे दृष्टिहीन हैं, उनके घर में कोई और नहीं है। उन्हें शनिवार को किसी ने बताया कि उनके पिता की जगह शहीदों में उनका नाम छापा गया है। उन्होंने बताया कि उनके पिता ने महात्मा गांधी के साथ मिलकर अंग्रेजों से लड़ाई लड़ी और कई बार जेल भी गए।
इसके बावजूद उनके पिता का नाम और उनकी जीवनी नहीं छापी गई। उन्होंने इसकी लिखित शिकायत शिक्षामंत्री से भी की है। यह सुनकर वह बहुत परेशान हैं और उन्होंने पत्र के माध्यम से शिक्षा मंत्री लक्ष्मण सिंह गौड़ को भूल सुधार के लिए निवेदन किया है।
पहले भी हुई हैं अपमान की घटनाएं
राजगढ़ निवासी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी पं. धूलजी त्रिवेदी का निधन 21 अक्टूबर को हो गया। उन्हें प्रशासन की ओर से मृत्यु उपरांत मिलने वाला सम्मान गार्ड ऑफ ऑनर नहीं दिया गया। प्रशासन ने यह कहकर पल्ला झाड़ लिया कि उनका नाम स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की सूची में नहीं है।
बाद में मीडिया में आई खबरों के बाद आनन-फानन में एसडीएम ने आदेश जारी कर दिए कि उनके नाम का एक स्मारक और एक सड़क का नामकरण कर दिया जाएगा। इसी तरह का मामला सारंगपुर के स्वतंत्रता सेनानी फूलचंद की मृत्यु के बाद सम्मान नहीं मिलने का भी हुआ है।