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इंदौर. ‘लोकायुक्त’ स्वतंत्र संगठन है, शासन द्वारा नियंत्रित नहीं इसलिए किसी भी पुलिस अफसर को उसकी सहमति के बगैर वहां स्थानांतरित नहीं किया जा सकता। यह फैसला हाईकोर्ट की इंदौर बैंच ने लोकायुक्त संगठन में स्थानांतरित पुलिस इंस्पेक्टर की याचिका पर दिया।
उसने अपनी पदस्थापना को चुनौती देते हुए सिंगल बैंच में याचिका दायर की थी जिसे सुनवाई के बाद खारिज कर दिया गया। उस आदेश के खिलाफ इंस्पेक्टर ने डिवीजन बैंच के समक्ष रिट अपील दायर की। उसमें कहा गया लोकायुक्त संगठन न तो राज्य शासन का विभाग है, न पुलिस या गृह विभाग का अंग।
ऐसे में पुलिस अफसरों को बगैर सहमति के वहां स्थानांतरित नहीं किया जा सकता। जस्टिस दीपक मिश्रा तथा शुभदा वाघमारे की बैंच ने याचिकाकर्ता के तर्क स्वीकारते हुए उसे लोकायुक्त संगठन में स्थानांतरित करने का आदेश रद्द कर दिया।
‘लोकायुक्त’ में पदस्थापना यानि लूपलाईन- लोकायुक्त संगठन में पुलिस अफसरों को प्रतिनियुक्ति पर भेजने को लेकर हमेशा विवाद होता है। कई बार तो सरकार को पदस्थापना आदेश भी बदलना पड़े क्योंकि इसे लूपलाईन की पोस्टिंग माना जाता है।
इसी कारण लोकायुक्त संगठन में कई पद खाली हैं। गृह विभाग ने कुछ समय पहले ऐसी पदस्थापना के पहले अफसरों से सहमति लेने की परंपरा शुरू की थी लेकिन पूरी तरह पालन नहीं हुआ।