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ही इज़ द बैस्ट

शाहरुख़ ख़ान की सबसे बड़ी विशेषता है- संकल्पशील स्वभाव। फ़ैसला लेने के बाद उससे फिरना उनके स्वभाव में ही नहीं है। सिर्फ़ प्रोफैशनल लाइफ़ में ही नहीं, पर्सनल लाइफ़ में भी वह ज़िद्दी हैं। रिश्तों को वह उसके चरम तक निभाना जानते हैं, चाहे उन्हें कितनी भी चुनौतियों का सामना करना पड़े। हमारी लव-स्टोरी को ही देखिए.. क़दम-क़दम पर उन्हें चुनौतियों का सामना करना पड़ा। अंतत: विजेता बनकर ही उन्होंने दम लिया।

हमारा विवाह कोई सामान्य विरोधों वाला अंतर्जातीय विवाह नहीं, बल्कि असंभव-सा काम था। मेरे पिता ठहरे फ़ौजी। घर में एकदम मिल्रिटी वाला अनुशासन था। भारतीय हिंदू संस्कृति और धार्मिक मूल्यों वाला परिवार था हमारा। मुस्लिम लड़के से शादी की कल्पना तक नहीं की जा सकती थी। मैंने शाहरुख़ को स्थिति की गंभीरता बताते हुए कहा कि मेरे पास फटकना भी उनके लिए ठीक नहीं होगा। लेकिन उन्होंने डरने के बजाय डर को फेस करने जैसा क़दम उठाया। मेरे जन्मदिन पर वह मेरे घर आ धमके और बड़े फिल्मी स्टाइल में सबका दिल जीत लिया।

एक्चुअली, उन दिनों उनका पहला सीरियल ‘फ़ौजी’ टैलीविज़न पर प्रसारित हो रहा था। इसकी कहानी फ़ौजी बैकग्राउंड पर थी। फ़ौजी परिवार होने के नाते हमारे घर में वह सीरियल Êारा ख़ास लोकप्रिय था। इस सीरियल में शाहरुख़ का नाम अभिमन्यु था। मेरे घर आने पर शाहरुख़ ने अभिमन्यु के नाम से ही अपना परिचय दिया। बर्थ डे पार्टी में अपनी चिकनी-चुपड़ी बातों और हंसमुख स्वभाव से उन्होंने सबका दिल जीत लिया। इस तरह उन्होंने मेरे घर के दरवाज़े अपने लिए खोल लिए। मेरे घर वालों को उनके मुस्लिम होने के बारे में बहुत बाद में पता चला। उनके रास्ते में न सिर्फ़ धर्म की दीवार खड़ी हुई थी, बल्कि प्यार अपने-आप में एक मुश्किल बन गया था।

दरअसल, मैं शाहरुख़ से बचने लगी थी, दूर भागने लगी थी। इसकी वजह यह थी कि वह मेरे प्रति हद से Êयादा पजेसिव थे। तब हमारी दोस्ती ही चल रही थी कि वह हर बात पर टोकते थे- बाल खुले मत रखो, ऐसे कपड़े मत पहनो, उससे मत मिलो, ऐसा मत करो.. वैसा मत करो। मैं उनकी दीवानगी से तंग आ गई थी। एक बार तो मैं इतनी तंग आ गई कि उन्हें बताए बग़ैर ही मैं कुछ दिनों के लिए मुंबई चली आई। लेकिन उन्होंने यहां भी मेरा पीछा नहीं छोड़ा। वह भी दो दोस्तों को साथ लेकर मेरे पीछे-पीछे मुंबई आ धमके और बिल्कुल फिल्मी स्टाइल में मुझे शहर की सड़कों-रेस्तराओं और चौपाटी पर खोजते फिरे। कई दिनों की मेहनत के बाद आख़िर उन्होंने मुझे ढूंढ़ ही लिया।

मैं उन्हें अक्सा बीच पर मिली। उस समय मैं थी तो सहेलियों के साथ, मगर मैं ख़ुद शाहरुख़ को बड़ा मिस कर रही थी। ख़ासकर मुझे अपना बर्थ डे याद आ रहा था, जो शाहरुख़ ने कुछ दिनों पहले ही बड़े स्पैशल ढंग से मनाया था और मुझे ढेर सारे गिफ्ट दिए थे। ख़ैर, शाहरुख़ को देखते ही ख़ुद मेरे अंदर भी भूचाल-सा उठा। हम दोनों एक-दूसरे की ओर दौड़े और गले लगकर रो पड़े। उस दिन मैंने भी महसूस किया कि इस श़ख्स के बग़ैर मैं नहीं जी सकती।

हम दोनों के सामने सबसे बड़ी चुनौती तब खड़ी हुई, जब हमने कोर्ट मैरिज करने का फ़ैसला किया। क़ानून के अनुसार हमें शादी से एक महीने पहले कोर्ट को नोटिस देना था और कोर्ट को एक महीने तक खुला नोटिस बोर्ड पर प्रदर्शित करना था। हमने बुद्धिमानी का काम यह किया कि अपने पते की जगह शाहरुख़ के एक दोस्त का पता लिख दिया। हमारे ख़ातिर शाहरुख़ के उस दोस्त को भी बहुत परेशानी उठानी पड़ी। हुआ यह कि हमारी अंतर्जातीय शादी को लेकर आवारा टाइप ¨हदू लड़कों की एक टोली शाहरुख़ की जान की दुश्मन बन गई, जो जब-तब शाहरुख़ के दोस्त के घर जाकर उपद्रव मचाती थी, क्योंकि हमने नोटिस में वही पता दिया था। इसी तरह कुछ मुस्लिम कट्टरवादी लोग भी उस पते पर जाकर हो-हल्ला मचाते थे। इन मुसीबतों के साथ-साथ हमें मेरे परिवार वालों को भी शादी के मामले में कनविंस करना था। ये बातें सुनने-पढ़ने में मामूली लग सकती हैं, लेकिन मामूली थी नहीं। उन परिस्थितियों में शाहरुख की जगह कोई और होता, तो हार कर लौट जाता, पर शाहरुख़ ने परिस्थिति से हारना सीखा ही नहीं है।

(जैसा उन्होंने अनिल राही को बताया)





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