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आतंकवाद से ज्यादा गंभीर है नक्सलवाद

अभिमत. नक्सली समस्या की जमीनी हकीकत जानने व हल की रणनीति बनाने की मुहिम के साथ केंद्रीय केबिनेट सचिव ने हाल ही में गृह सचिव सहित एक दर्जन आला अफसरों के साथ झारखंड व छत्तीसगढ़ का दौरा किया था।

दौरे व बैठकों का निष्कर्ष तो अभी तक सामने नहीं आया लेकिन इस पहल के तुरंत बाद ही दोनों राज्यों में नक्सलियों ने दो बड़े नरसंहारों को अंजाम देकर खूनी-खेल जारी रखने का पैगाम दे दिया।

चार दशक पुरानी नक्सल समस्या आज देश के 11 राज्यों तक फैल गई है। प्रधानमंत्री द्वारा इसे देश की आंतरिक सुरक्षा को खतरा करार दिए जाने के बाद भी नक्सलवाद को खत्म करने के प्रति कोई वैकल्पिक रणनीति सरकारें नहीं बना सकी हैं। एक तरह से देखा जाए तो नक्सलियों की हिंसा के सामने सुरक्षा की तमाम घेराबंदी घुटने टेकती नजर आती है।

इसकी एक वजह तो यह भी है कि केंद्र व राज्यों के स्तर पर निरंतर विचार विमर्श व योजनाएं बनाते रहने के बाद भी आतंकवादी हिंसा की तुलना में नक्सली हिंसा की गंभीरता को सरकारों के स्तर पर प्राथमिकता नहीं मिल पाई है। मीडिया में भी आतंकवादी हिंसा की छोटी घटनाओं के सामने नक्सलियों द्वारा किए गए बड़े-बड़े नरसंहार भी नजरअंदाज होते रहे हैं।

शायद इसकी वजह यह भी है कि शहरों में होने वाली आतंकवादी हिंसा की बजाय नक्सली हिंसा के शिकार दूरदराज के जंगली व पहाड़ी इलाके होते हैं जहां जान गंवाने वाले सुरक्षाबल के लोग या गरीब आदिवासी ही होते हैं।

नक्सली हिंसा का सीधा संबंध उन इलाकों या समुदायों के विकास से है जो आजादी के 6 दशक बाद भी हाशिए पर पड़े हैं तथा जिन्हें जीवन की मूलभूत सुविधाएं भी आसानी से उपलब्ध नहीं हैं।

यह समस्या आंतरिक सुरक्षा के खतरे के साथ-साथ विकास के लिए भी बड़ी चुनौती है। विकास नहीं तो नक्सली और नक्सली नहीं तो विकास के इस चक्रव्यूह को तोड़ने के लिए बैठकों और फाइलों से आगे एक वैकल्पिक रणनीति तक जाने की जरूरत है।





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