जीवन दर्शन. रमजान का महीना बहुत पवित्र माना जाता है। हर मुसलमान की यह ख्वाहिश रहती है कि इस माह में जितना बन सके, दान-पुण्य करें। रोजे और नमाज के साथ-साथ जकात फितरा देकर गरीबों की मदद का भी बहुत महत्व है।
बात उस समय की है जब मैं गांधीनगर में केंद्रीय विद्यालय में कार्यरत थी, रमजान का महीना चल रहा था, मेरा ऐसा मानना है कि जो घर-घर जाकर मांगते हैं उन्हें तो सभी लोग खैरात व जकात देते हैं, पर कई ऐसे जरूरतमंद गरीब भी रहते हैं जो खुद्दारी और शर्म की वजह से कहीं जाकर मांग नहीं पाते। अगर उन तक पहुंच कर उनकी मदद की जाए तो ज्यादा सवाब का काम है।
मैंने स्कूल आने जाने के लिए रिक्शा लगा रखा था। रिक्शा वाला कोई पटेल था। इक्कीसवें रोजे के दिन मेरी सहेली रूमाना और मैंने तय किया कि पास के पेथापूर में गरीबों की बस्ती है क्यों न उनके बीच पहुंच कर जकात दी जाए। एक दिन पटेल का रिक्शा तय कर के हम लोग कपड़े, अनाज व कुछ जरूरत की चीजें लेकर गरीबों की बस्ती में पहुंचे। गलियों में छोटे-छोटे घरों और झोपड़ों में बेइंतहा गुरबत थी।
हमने पटेल रिक्शावाले की मदद से कई घरों में कपड़े, अनाज और पैसे तकसीम किए। नए कपड़े देख बच्चों के चेहरो पर फैली खुशी मजबूर और मोहताज लोगों में कृतज्ञता का भाव था। रोजा खोलने से पहले हम लोग घर लौटे और पटेल का शुक्रिया अदा करते हुए रिक्शे के भाड़े के रूप में सौ रुपए देने लगे।
पटेल ने हाथ जोड़कर सौ का नोट वापिस करते हुए कहा .दीदी जहां आपने इतना किया वहां थोड़ा सा साथ देकर मुझे भी सवाब कमाने का मौका मिल गया आप पैसे देकर इस पुण्य को कम मत करिए। मैं लाजवाब हो गई, लगा इंसानियत और दया किसी एक धर्म की बात नहीं है अपितु यह सभी धर्मो का मूलमंत्र है।