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पाक में इमरजेंसी का मतलब

दृष्टिकोण. mush इतिहास खुद को दोहराता है। किसी अन्य देश के मुकाबले पाकिस्तान में इतिहास अपने आपको अक्सर ज्यादा दोहराता है। पिछले साठ सालों के दौरान नियमित अंतराल से फील्ड मार्शल अयूब खान, जनरल याहया खान और जनरल जिया-उल-हक द्वारा निर्वाचित सरकारों को बर्खास्त किया जाता रहा है। अब जनरल परवेज मुशर्रफ ने आठ साल में दूसरी बार इसी प्रक्रिया को दोहराया है।

जिन तानाशाहों का जिक्र ऊपर किया गया है उनमें से हर-एक का दावा रहा है कि उनके सामने आपातकाल-मार्शल लॉ की घोषणा करने के अलावा कोई रास्ता नहीं था और पाकिस्तान की बेहतरी के लिए यह कदम उठाया जाना अनिवार्य था। राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ ने पूर्ववर्ती सभी तानाशाहों को पीछे छोड़ते हुए 1999 के बाद शनिवार को दूसरा तख्तापलट कर दिया।

क्या भारत को पाकिस्तान के घटनाक्रम पर प्रतिक्रिया व्यक्त करनी चाहिए? कागजों पर तो यह विचार व्यक्त किया जा सकता है कि हाल ही का तख्तापलट पाकिस्तान का अंदरूनी मामला है। हकीकत यह है कि हम जिस दुनिया में रहते हैं वहां सभी देश एक-दूसरे पर निर्भर हैं और पाकिस्तान में जो कुछ भी होता है उससे भारत सीधे तौर पर प्रभावित होता है। सबसे नजदीकी पड़ोसी मुल्क में अस्थिरता, अनिश्चय और ऊहापोह की स्थिति भारत के लिए चिंता का विषय है।

फिलहाल जनरल मुशर्रफ पाकिस्तान में लोकतंत्र की बहाली का अपना वादा भूल चुके हैं। पूर्व प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो को सत्ता में भागीदारी देने और सैन्य वर्दी उतारने संबंधी जो बयान उन्होंने कई बार सार्वजनिक तौर पर दिए थे वह हवा में कहीं उड़ चुके हैं। शनिवार को राष्ट्र के नाम प्रसारित उनका संदेश ऐसी कवायद थी जिसमें जैसे चालाकीपूर्ण तरीके से भी अपने कदम का औचित्य साबित नहीं कर पाए। जनरल मुशर्रफ के अमेरिकी दोस्त तक इमरजेंसी की घोषणा पर खेद व्यक्त कर चुके हैं। इससे ज्यादा कुछ कर पाना उनके वश में है भी नहीं।

भारत के लोगों की यह जानने की उत्सुकता हो सकती है कि पाकिस्तान के ताजा घटनाक्रम से भारत-पाक संबंधों पर क्या असर पड़ेगा। पिछले तीन साल से दोनों देश तमाम मुद्दों पर समग्र वार्ता कर रहे हैं। मैं जब विदेश मंत्री था तब मेरी हरचंद कोशिश रहती थी कि यह समग्र वार्ता आगे बढ़ती रहे। पाकिस्तान जैसे पड़ोसी देश के साथ अच्छे संबंध रखना हमारे हित में है। मगर ध्यान रहे कि ताली दोनों हाथ से बजती है।

हमारे स्तर पर यह नहीं सोचा जाना चाहिए कि पाकिस्तान में इमरजेंसी लगने से समग्र वार्ता पटरी से उतर जाएगी। वैसे भारत-पाक संबंधों में कभी भी उतार-चढ़ाव आना सामान्य बात है। परेशानियों से घिरे जनरल मुशर्रफ के पास भारत-पाक समग्र वार्ता को आगे बढ़ाने के लिए फिलहाल ज्यादा समय नहीं होगा। उनकी प्राथमिकता उनके खुद के द्वारा खड़ी की गई घरेलू समस्याओं को सुलझाने की होगी।

मुशर्रफ शेर की सवारी कर रहे हैं। उनके इरादे क्या हैं? वे इमरजेंसी कब तक लागू रखेंगे-तीन महीने, छह महीने या फिर एक साल? चुनाव कब कराए जाएंगे? वे बेनजीर भुट्टो के साथ क्या रवैया अपनाएंगे? तालिबान और अल कायदा से वे किस तरह निपटेंगे? ये तमाम सवाल हवा में तैर रहे हैं। संयोग से कश्मीर के ऊंचे इलाके इन दिनों बर्फ से पटे हैं। इसलिए मुशर्रफ उस मोर्चे पर कोई गड़बड़ी करने की स्थिति में नहीं है। वे सीमा पार से घुसपैठ बढ़ाने या फिर सैनिक गतिविधियों को अंजाम देने की बात सोच भी नहीं सकते हैं।

एक सवाल यह भी है पूछा जा रहा है कि क्या जनरल मुशर्रफ का इमरजेंसी लगाने का एलान चौंकाने वाला है? इस सवाल का जवाब न में ही दिया जा सकता है। अभी दो महीने पहले ही इस बात के प्रबल संकेत मिले थे कि मुशर्रफ इमरजेंसी लगाने वाले हैं। तब अमेरिकी दूतों ने दौड़-भाग कर और दबाव बनाकर उन्हें ऐसा करने से रोक दिया था। इस बार वे ऐसा नहीं कर पाए।

दरअसल जनरल मुशर्रफ ने इमरजेंसी लगाने की जानकारी अमेरिका को पहले ही दे दी थी। अमेरिका ने इमरजेंसी लगाए जाने पर औपचारिक तौर पर खेद तो जताया है मगर वह पाकिस्तान को दी जा रही तमाम सहायता पर रोक नहीं लगाएगा। आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक लड़ाई में अपने प्रमुख सहयोगी के साथ संबंधों में किसी तरह का तनाव बढ़ाना उसके हित में नहीं होगा।

पाकिस्तान दुनिया के महत्वपूर्ण मुस्लिम देशों में एक है। उसकी भौगोलिक स्थिति ने आतंकवाद के खिलाफ युद्ध में उसकी भूमिका को अहम बना दिया है। अमेरिका को उसकी जरूरत है। जनरल मुशर्रफ को भी अमेरिका की जरूरत है। रूस और चीन भी पाकिस्तान में इमरजेंसी लगाए जाने के खिलाफ ज्यादा बोलने से रहे। उनकी प्रतिक्रिया में सावधानी बरता जाना लाजिमी है।

भारत ने भी संतुलित प्रतिक्रिया व्यक्त करके बुद्धिमत्तापूर्ण काम किया है। हकीकत है कि पाकिस्तान में लोकतंत्र की जड़ें अब तक नहीं जम पाई हैं। वहां की निर्वाचित सरकारें भी समर्थन के लिए सेना की मोहताज रहती आई हैं। सेना के कमांडर अभी जनरल मुशर्रफ के साथ हैं। वे पाकिस्तान में बेहद ताकतवर हैं। उनकी सहमति के बगैर मुशर्रफ इमरजेंसी लगाने का गैर-कानूनी कदम उठा ही नहीं सकते थे।

पाकिस्तान परमाणु शक्ति संपन्न देश है। इस वजह से उसके सबसे करीबी मित्र और सहयोगी देश भी उस पर एक सीमा से ज्यादा दबाव नहीं डाल सकते हैं। अराजकता और संशय के माहौल में परमाणु हथियार दागने का बटन गलत हाथों में जा सकता है। ऐसा आम तौर पर नहीं होता है, पर जोखिम तो है ही।

-लेखक भारत के विदेश मंत्री रह चुके हैं।





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