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जनरल का दांव

सम्पादकीय. जनरल परवेज मुशर्रफ ने अपनी सल्तनत बचाने के लिए ‘गैर कानूनी’ इमरजेंसी थोपकर पाकिस्तान के 60 साल के इतिहास में एक और काला अध्याय जोड़ दिया है। इमरजेंसी की चाबुक के सहारे वे देश की सत्ता की नकेल पर कुछ और दिन अपनी पकड़ भले ही बनाए रखें मगर इस करतूत के लिए पाकिस्तान की अवाम और दुनियाभर के लोकतंत्र के पैरोकार उन्हें कभी माफ नहीं करेंगे।

मुशर्रफ ने इमरजेंसी थोपे जाने के दो कारण बताए हैं-पहला, इस्लामिक आतंकवाद और दूसरा, न्यायपालिका का दखल। इनमें से पहले कारण के लिए तो वे और उनके सलाहकार खुद ही जिम्मेदार हैं। मुशर्रफ और उन सरीखे लोगों ने ही इस्लामिक आतंकवाद के पौधे को पानी और खाद देकर विकराल रूप दिया है।

अपने पड़ोसी देशों का अमन-चैन लूटने के लिए उन्हें आतंकवाद का निर्यात करने में आत्म-मुग्ध रहने वाले मुशर्रफ और उनके साथी अपने सरपरस्त अमेरिका की शाबासी पाने के लिए आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक युद्ध में भागीदार बने जरूर पर बेमन से।

न्यायपालिका के बढ़ती दखल को इमरजेंसी थोपे जाने का दूसरा कारण बताकर मुशर्रफ ने कानून के शासन की घोर अवमानना के नापाक इरादे ही जाहिर किए हैं। दरअसल पाकिस्तान की न्यायपालिका ने कुछ महीने पहले ही पहली बार अपने स्वतंत्र वजूद को पहचाना था तथा सेना व सरकार के इशारे पर नाचने की बजाय संविधान और कानून के शासन की स्थापना और संचालन की जिम्मेदारी निभाना शुरू की थी।

मुशर्रफ को न्यायपालिका का यह रवैया नागवार लगना ही था। अपने फिर से राष्ट्रपति चुने जाने के मामले में सुप्रीम कोर्ट का विपरीत फैसला आने पर बेआबरू होकर सत्ताच्युत होने की तलवार सिर पर लटके होने से वे घबराए हुए थे। इसी वजह से उन्होंने इमरजेंसी लगाए जाने के बाद बिना देर किए सुप्रीम कोर्ट के सभी वरिष्ठ जजों को बर्खास्त कर अपनी पसंद के चीफ जस्टिस की नियुक्ति कर दी।

सत्ता के इशारे पर काम करने वाली न्यायपालिका की पाकिस्तान में पुरानी परंपरा है। नए चीफ जस्टिस अब्दुल हमीद डोंगरा ने पद संभालते ही मुशर्रफ राग अलापना शुरू कर दिया और अपने पूर्ववर्ती इफ्तिखार चौधरी के दौर के तमाम फैसले पलटने का एलान कर दिया।

पाकिस्तान के राजनीतिक हालात पहले से ही बुरी तरह उलझे हुए थे। मुशर्रफ ने इमरजेंसी थोपकर अपने लिए एक और बला न्योत ली है। वे कितनी ही कोशिश क्यों न कर लें, पाकिस्तान की जम्हूरियत पसंद अवाम उन्हें ज्यादा दिन बर्दाश्त नहीं करेगी।





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