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..ताकि पड़ोसी हमसे अदावत न माने

राजस्थान के राज्यपाल उन गिने-चुने कूटनीतिज्ञों में हैं, जिन्हें पाकिस्तान की अंदरूनी राजनीति और अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर विशेषज्ञता हासिल है। वे लंबे समय तक पाक में भारतीय उच्चायुक्त रहे। इमरजेंसी के बाद पाकिस्तान के हालात पर उन्होंने लिखा खास भास्कर के लिए :

पाकिस्तान में फौजी हुकूमत का रिवाज बड़ा पुराना है। इस मुल्क का अवाम हर बार कोशिश करता है कि कदम जम्हूरियत की तरफ बढ़े, पर यह हो नहीं पा रहा। पर कोशिश shailendraहोनी चाहिए कि पड़ोसी हमसे अदावत न माने। सब कुछ सहज और स्वाभाविक रहे। ऐसा नहीं लगे कि हम उनके अंदरूनी मामलों में दखल दे रहे हैं। तत्कालीन प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी ने पाकिस्तान के राष्ट्रपति जनरल परवेज मुशर्रफ को आगरा में बुलाया था। तब हमारे दिल में बहुत शुबहे थे। फिर भी सारी दुनिया अचंभे में आ गई थी। तब हमने अच्छे रिश्तों के लिए पहल की थी। अब भी सरकार ठीक कह रही है कि हमारा पड़ोसी मुश्किल में है।

ये सोचना कि पाकिस्तान में इमरजेंसी से हमारा फायदा हो रहा है या इससे हमारा नुकसान हो जाएगा, तो यह गलत है। जब हमारे सारे पड़ोसी देशों में यही हो रहा है तो फिर पाकिस्तान को लेकर आश्चर्य क्यों हो? अफगानिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल और श्रीलंका में भी कमोबेश ऐसा ही हो रहा है।

हमारे इन सब पड़ोसियों की तकलीफ आंतरिक है। हर देश में, हर समाज में, लड़ाई करने वाले बहुत सारे लोग हो गए हैं। इससे लोकतंत्र पर दबाव बढ़ा है। कच्चे और कमजोर लोकतंत्रों पर दबाव और ज्यादा पड़ रहा है। भाईचारे की भावना मजबूत रहे और हम एक-दूसरे की तकलीफ को समझें तो मुश्किलें आसानी से हल हो सकती हैं।

पड़ोसी मुल्क में हालात बदलने का असर हम पर भी पड़ेगा, लेकिन हमें प्रजातंत्रवाद और भाईचारे को पुख्तगी देते रहना होगा। हम अपने प्रजातंत्र को ठीक रखें। विदेश नीति को बेहतर रखें। पाकिस्तान में इमरजेंसी लगने से दोनों मुल्कों के अवाम के सांस्कृतिक, व्यापारिक और शैक्षिक रिश्ते प्रभावित नहीं होने चाहिए।

हम सांस्कृतिक आदान-प्रदान करते रहें। एक-दूसरे के विश्वविद्यालयों में पढ़ने-पढ़ाने का काम हो। एक-दूसरे के अस्पतालों का उपयोग करें। उनकी सुविधा का हम खयाल रखें, वे हमारी सुविधा पर ध्यान दें। ऐसे बहुत से क्षेत्र हैं, जहां हम परस्पर सहयोगी हो सकते हैं। आखिर ऐसा अमेरिका और कनाडा के बीच ही क्यों होता है? भारत और पाकिस्तान में क्यों नहीं हो सकता?

हम एक-दूसरे के सहयोगी बनें। इसी से जनता के दिलों में विश्वास और संतोष रहेगा। एक-दूसरे के बारे में जानें-समझें। ऐसा होगा तो पड़ोसी मुल्क के हालात भी और अच्छे होंगे। हमारी मुश्किलें भी कुछ कम होंगी। पाकिस्तान में इन दिनों जो भी हो रहा है, वह ऐतिहासिक मुश्किलों का दौर जान पड़ता है।

परवेज मुशर्रफ बहुत सारी परेशानियों से घिर गए हैं। ओसामा बिन लादेन के लोगों ने उन्हें घेर रखा है। तालिबान की चुनौती का सामना भी वे कर रहे हैं। लाल मस्जिद वाला मसला अभी सुलझा भी नहीं है कि नवाज शरीफ की मुस्लिम लीग ने चुनौती खड़ी कर दी है। बेनजीर भुट्टो की पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी ने लोगों को आंदोलित कर दिया है। न्यायपालिका ने अलग मुशर्रफ को हैरान कर दिया।

मुझे तो लगता है, मुशर्रफ ने इमरजेंसी नहीं, जनरल जिया उल हक के कार्यकाल वाला पुराना मार्शल लॉ ही वापस लागू कर दिया है। भगवान करे, मेरी यह भविष्यवाणी गलत साबित हो। मुशर्रफ ने जैसे ही चुनाव का एलान किया, सेना महसूस करने लगी थी कि उन्होंने सब गड़बड़ कर दिया। यह सब काफी खराब है और इससे पड़ोसी मुल्क में जो कदम प्रजातंत्रवाद की तरफ लौटते दिख रहे थे, वे अब वापस होते दिख रहे हैं।

पाकिस्तान में इमरजेंसी का असर तो पड़ेगा ही। हम जैसी मित्रता चाहते हैं, वह मुश्किल होगी। उनकी और हमारी जनता का आपस में मिलना-जुलना नहीं हो पाएगा। इसका असर व्यापार और अर्थव्यवस्था पर भी पड़ेगा। पाकिस्तान ने पिछले दिनों आलू-प्याज और खाने-पीने की बहुत सारी चीजें पहली बार ट्रकों के जरिए हमसे मंगवाई थीं। यह अच्छी बात थी।

दोनों देशों के रिश्ते ठीक होने से पहले यह सब चीजें पंजाब, उत्तरप्रदेश आदि राज्यों से पहले मुंबई जाती, फिर जहाज से कराची के जरिए पाकिस्तान के बाकी शहरों में पहुंचाई जाती थीं। एकबारगी हालात काफी बदल गए लगते हैं, लेकिन हमें आगे के लिए आशावान रहना चाहिए। आखिर उम्मीदें और सपने बुनकर ही हम हकीकत की बुनियाद तैयार करते हैं।





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