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कोटा. मेडिकल कॉलेज कोटा के न्यूरोसर्जरी विभाग व आईएमए के संयुक्त तत्वावधान में रंगबाडी रोड स्थित मेडिकल कॉलेज ऑडिटोरियम में रविवार को आयोजित
न्यूरोसर्जरी की सेमिनार में विशेषज्ञ चिकित्सकों ने जोर दिया कि लोगों को इस प्रकार की पीड़ा से छुटकारा पाने के लिए नई स्पाईनल सर्जरी बेहतर विकल्प है।
कार्यक्रम के मुख्यअतिथि वर्धमान महावीर खुला विवि के पूर्व कुलपति प्रो.जीएसएल देवड़ा ने कहा कि कमर, पीठ, गर्दन, कंधे आदि के दर्द पहले बुजुर्र्गो में हुआ करते थे लेकिन अब युवाओं में भी यह आम बात हो गई है। इसका प्रमुख बदलती जीवनशैली है। इस जीवन शैली को बदला तो नहीं जा सकता लेकिन नई से नई तकनीक की खोज की जा सकती है जिससे इसका उपचार आसानी से हो सके। मेडिकल कॉलेज की अतिरिक्त प्रिंसिपल पुष्पा जैन ने न्यूरो सर्जरी विभाग की गतिविधियों के बारे में जानकारी दी। इससे पूर्व सभी अतिथियों का स्वागत किया गया।
लोगों की अनियमित दिनचर्या के कारण बढ़ रहे रीढ़ की हड्डी, पीठ दर्द, गर्दन दर्द, कमर दर्द व डिस्क फालेप्स रोक से कैसे छुटकारा पाया जाए, इस बारे में रविवार को न्यूरो सर्जरी विभाग की ओर से आयोजित सेमिनार में विशेषज्ञों ने खुलकर चर्चा की। उन्होंने कहा कि यदि व्यक्ति अपनी दिनचर्या पर ध्यान दे तो इन रोगों से छुटकारा पाया जा सकता है। इनसे बचाव के लिए आधुनिकतम तकनीक के बारे में उन्होंने जानकारी दी।
* कोटा में भी उपलब्ध है दूरबीन सुविधा
राजकीय महाराव भीमसिंह चिकित्सालय के न्यूरो सर्जन डॉ. कृष्णहरि शर्मा ने बताया कि कोटा मेडिकल कॉलेज के न्यूरोसर्जरी विभाग में कमर व गर्दन दर्द अत्याधुनिक दूरबीन पद्दति से उपचार किया जा रहा है। इसका पूरा लाभ हाडोती के मरीजों को मिल रहा है। इससे पहले यह सुविधा नहीं होने से यहां के मरीजों को दूसरे शहरों में जाना पड़ता था, जो काफी खर्चीला होता था।
* बढ़ रहा है कमर व पीठ दर्द
न्यूरो सर्जन विशेषज्ञ चिकित्सकों ने माना कि बदलते परिवेश में लोगों की जीवन स्टाइल में बदलाव आया है। इसके कारण लोगों में कमर, पीठ व गर्दन दर्द बढ़ता जा रहा है। आज हर व्यक्ति घर व आफिस में इतना व्यस्त रहता है कि वह अपने शरीर पर पूरी तरह ध्यान नहीं दे पाता है।
ये हैं दर्द के कारण
* नियमित योग व कसरत नहीं करना।
* कुर्सी पर लंबे समय तक बैठना।
* क्षमता से अधिक वजन उठा लेना।
* उठने, बैठने एवं सोने में लापरवाही बरतना।
* बिना गाइडेंस के जिम में वेट लिफ्टिंग करना।
* खान पान पर नियंत्रण नहीं होना।
हो सकती है रोकथाम
* नियमित योगाभ्यास करें
* खान-पान पर नियंत्रण रखें।
* दिनचर्या सामान्य रखें
* लंबी बैठक नहीं करें, करें तो बीच-बीच में इसमें बदलाव करते रहें।
ओजोन थैरेपी कारगर
रीढ़ की हड्डी, जोड़ों के दर्द व साइटिका के दर्द में ओजोन थेरेपी काफी कारगर साबित हो रही है। यह बात इन्द्रप्रस्थ अपोलो हॉस्पिटल नई दिल्ली के वरिष्ठ न्यूरोसर्जन डा. विजय शील कुमार ने दी। वे यहां मेडिकल कालेज में आयोजित न्यूरोसर्जरी की सेमिनार में शामिल होने आए हैं। उन्होंने बताया कि इस पद्धति में ओजोन इंजेक्शन रीढ़ की हड्डी में इंजेक्ट किया जाता है। रोगी को ओजोन इंजेक्शन लगवाने के लिए सप्ताह में तीन से पांच बार अस्पताल बुलाया जाता है। इसके बाद रोगी को रीढ़ की हड्डी एवं जोड़ों के दर्द से पूरी तरह छुटकारा मिल जाता है और सर्जरी की रिस्क काफी कम हो गई है।
दूरबीन पद्धति से बेहतर इलाज
सर गंगाराम हास्पिटल के न्यूरोसर्जन डा. सतनाम छाबड़ा ने बताया कि गर्दन व कमर में डिस्क फालेप्स कॉमन समस्या है। स्लिप डिस्क में लगभग 80 प्रतिशत लोग दवाइयों से ही ठीक हो जाते है। 20 प्रतिशत लोग दवाइयों से ठीक नहीं हो पाते हैं। ऐसे रोगियों को चिकित्सक की सलाह लेकर तुरंत ऑपरेशन करा लेना चाहिए। दूरबीन पद्धति से ऑपरेशन करना आसान हो गया है। इस पद्धति में रोगी को मात्र एक-डेढ़ इंच का चीरा लगाकर ऑपरेशन कर दिया जाता है और 24 घंटे में रोगी को अस्पताल से छुट्टी दे दी जाती है।
कृत्रिम डिस्क से उपचार
मेक्स हॉस्पिटल दिल्ली के डा. विपिन वालिया ने बताया कि रीढ़ की हड्डी की डिस्क की बीमारियों में स्पाईन सर्जरी के जरिए पुरानी डिस्क की जगह कृत्रिम डिस्क लगा दी जाती है। इसका ऑपरेशन आसानी से हो जाता है। रोगी को अस्पताल में एक दिन ही रुकना पड़ता है। उन्होंने बताया कि पहले भी रीढ़ की हड्डी का दर्द का उपचार किया जाता था। इसमें डिस्क को निकालकर हड्डियों को जोड़ा जाता था। इससे स्पाईन की क्षमता कम हो जाती थी और साथ वाली डिस्क भी खराब होने लगती थी। लेकिन, ‘की हॉल’ पद्धति से कृत्रिम डिस्क आसानी से लगा दी जाती है। 95 प्रतिशत लोगों को रीढ़ की हड्डी का दर्द कभी ना कभी होता ही है। इनमें से ऑपरेशन की जरूरत एक से 2 प्रतिशत लोगों को ही पड़ती है।