भोपाल. अपने इलाज के लिए सरकारी अस्पतालों पर निर्भर रहने वाले शहरवासियों को दीपावली पर आतिशबाजी करने से पहले पूरी सतर्कता बरतनी पड़ेगी। ऐसा इसलिए कि दुर्भाग्यवश वे जल गए, तो इलाज मिल पाना आसान नहीं होगा। वजह यह कि राजधानी में हमीदिया अस्पताल को छोड़कर जेपी, काटजू और कस्तूरबा अस्पताल में बर्न वार्ड नहीं है। हमीदिया का बर्न वार्ड भी मूलभूत सुविधाओं से वंचित है।
एसी खराब हैं: रविवार को भास्कर संवाददाताओं ने अस्पतालों में जलने के इलाज की स्थिति का जायजा लिया। हमीदिया में पता चला कि वहां के एसी लंबे समय से खराब हैं। पलंग भी उम्र पूरी कर चुके हैं। गद्दों में लगा जूट जगह-जगह से निकल रहा है। छत की हालत इतनी खस्ता है कि यहां जगह-जगह से सीलिंग उखड़ी हुई है।
इस वार्ड में हर महीने औसतन 30 मरीज भोपाल और आसपास के जिलों से आते हैं। डाक्टर मानते हैं कि जले हुए मरीज की मृत्यु का प्रमुख कारण संक्रमण होता है, इसके बावजूद इस वार्ड में बड़ी संख्या में मच्छर मिले। यहां भर्ती एक मरीज के परिजन ने बताया कि कभी-कभी तो अस्पताल से दवा मिल जाती है जबकि कई बार बाजार से खरीदकर लानी पड़ती है।
जूनियर डाक्टर्स एसोसिएशन (जूडा) के पूर्व उपाध्यक्ष डा. हितेश शर्मा बताते हैं कि इस वार्ड के लिए अलग से कोई स्टाफ नहीं रखा गया है। एसोसिएशन के प्रदेश अध्यक्ष डा. जीवन सिंह मीणा ने कहा कि वार्ड में एसी लगवाने की मांग को लेकर अस्पताल प्रबंधन को ज्ञापन सौंपा जाएगा। हमीदिया के प्लास्टिक सर्जरी और बर्न के विभागाध्यक्ष डा. पीके शर्मा ने स्वीकार किया कि यहां के एसी खराब हैं और सीलिंग टूटी है।
ऐसा है कस्तूरबा :
300 बिस्तर वाले भेल के सबसे बड़े कस्तूरबा अस्पताल में बर्न वार्ड नहीं है। 40 फीसदी से कम जले मरीजों के लिए एक कमरे में तीन पलंग रखकर मरीज को ढंकने के लिएइफाक्यूटर लगा दिया गया है।
बीमा अस्पताल का हाल :
भेल क्षेत्र के ही 100 बिस्तर वाले बीमा अस्पताल में जलने वाले किसी भी मरीज को भर्ती ही नहीं किया जाता है। यहां के अधीक्षक डा. एसके मालवीय ने बताया कि बर्न वार्ड व विशेषज्ञ न होने के कारण यहां आने वाले मरीजों को इलाज के लिए हमीदिया अस्पताल भेज दिया जाता है।
संक्रमण से होती है ज्यादातर की मौत :
>> जले हुए ज्यादातर व्यक्तियों की मौत संक्रमण से होती है। इसमें सेप्टिसीमिया और फ्लूड इमबैलेंस के कारण होती है। बर्न वार्ड के लिए यह जरूरी है कि वहां स्वच्छता का विशेष ध्यान रखा जाए। बर्न वार्ड में एसी आवश्यक रूप होना चाहिए जिससे तापमान नियंत्रित रहे। चादर हर दिन बदली जानी चाहिए, क्योंकि यह एक ही दिन में संक्रमित हो जाती है। बर्न वार्ड ऐसे स्थान पर होना चाहिए जहां मच्छर-मक्खी प्रवेश न कर सकें।
डा.दीपक चतुर्वेदी, संचालक अक्षय अस्पताल
हर साल दीपावली पर बढ़ रहीं दुर्घटनाएं (अस्पतालों के आंकड़े)
-वर्ष 2000 ———-40
- ,, 2001 ————24
- ,, 2002 ———-54
- ,, 2003 ———-48
- ,, 2004 ———— 51
- ,, 2005 ————56
- ,, 2006 ————-59