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अभिमत. चंडीगढ़ पहुंचते ही मास्टर ब्लास्टर सचिन तेंडुलकर ने अप्रत्याशित रूप से टेस्ट कप्तान बनने से मना कर दिया और अगले दिन अपने दोनों बच्चों व पत्नी अंजली के साथ खूबसूरत सुखना झील की सैर के लिए निकल पड़े। उन्हें देख कर लग रहा था कि वे तनावरहित रहना तथा किसी बड़ी जिम्मेदारी से बचना चाहते हैं। आखिर ऐसा क्यों? कप्तान बनने की प्रारंभिक स्वीकृति दे देने के बाद वे बैक-फुट पर क्यों चले गए?
सचिन के इन्कार के बारे में तर्क दिया जा रहा है कि वे सीनियर खिलाड़ियों की उपेक्षा और चयन समिति की कार्यशैली से संतुष्ट नहीं है। उन्हें राहुल द्रविड़ को बाहर किया जाना अच्छा नहीं लगा है। अगर यह सच है तो कप्तान बनने के बाद क्या राहुल को वापस लाने में वे भूमिका नहीं निभा सकते थे? सच्चई यह है कि वे क्रिकेट की राजनीति से बचना चाहते हैं। उन्होंने यह भी देख लिया कि युवाओं का पलड़ा भारी होता जा रहा है तो हवा का रुख देख कर कह दिया कि किसी युवा को कप्तान बनाया जाए। सचिन ने इस बार सफलतम कप्तान सौरव गांगुली का नाम नहीं लिया जिनके समर्थन में वे पहले कप्तानी छोड़ चुके हैं। न ही उन्होंने वीवीएस लक्ष्मण या अनिल कुंबले का नाम लिया। इसका मतलब तो यही है कि वे सीनियर खिलाड़ियों के हित में आवाज बुलंद नहीं करना चाहते हैं।
इसमें कोई शक नहीं कि टीम में सचिन का सभी सम्मान करते हैं लेकिन उन्हें पता है कि कप्तानी कांटों की सेज है अत: उससे बच कर रहना चाहिए। टीम हित में देखें तो सचिन ने अच्छा नहीं किया। उन्हें कप्तानी तश्तरी में सौंपी जा रही थी फिर भी हिम्मत नहीं दिखा सके। हां, अपने निर्णय से चयनकर्ताओं की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिन्ह अवश्य खड़ा कर दिया।