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दृष्टिकोण. तेहरान में उस दिन हजारों की भीड़ पूर्व अमेरिकी दूतावास के सामने अपने वार्षिक मार्च पास्ट को अंजाम देते हुए अमेरिकी विरोधी नारे लगा रही थी। इसी बीच पाकिस्तान में जनरल परवेज मुशर्रफ ने आपातकाल लगा संविधान निलंबित कर दिया था और सैकड़ों वकीलों और विपक्षी नेताओं को गिरफ्तार कर लिया था। इन दो अलग-अलग देशों के संदर्भ में स्वाभाविक प्रoA उठता है कि मुस्लिम राष्ट्रों के क्रम में अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव के दावेदार किन देशों को अमेरिकी हितों के लिए सबसे बड़ा संभावित खतरा मानते हैं? इस प्रoA का सही जवाब ईरान है। इसे 2002 में ‘शैतान की धुरी’ का एक अहम हिस्सा करार दिया गया था। यही नहीं ‘तृतीय विश्वयुद्ध’ सरीखा शब्द भी पिछले दिनों इसी देश के राष्ट्रपति के ओंठों से निकलता सुनाई पड़ा। अब दूसरा प्रoA: मुस्लिम राष्ट्रों में अमेरिकी हितों के लिए वास्तव में कौन सा देश सबसे बड़ा खतरा है? आज के संदर्भो में इसका सही जवाब पाकिस्तान है।
कारण, ईरान अमेरिकी विरोधी आतंकियों को शरण दे भी सकता है या नहीं भी दे सकता है, लेकिन पाकिस्तान के सीमावर्ती क्षेत्रों में अल कायदा और तालिबान लड़ाकों की उपस्थिति पुष्ट है। आने वाले दशकों में ईरान परमाणु अस्र बना भी सकता है और नहीं भी, लेकिन पाकिस्तान परमाणु परीक्षण कर चुका है। मुशर्रफ ने परमाणु तकनीक के अंतरराष्ट्रीय ब्लैक मार्केट के सिरमौर अब्दुल कदीर खान को पाकिस्तान के परमाणु बम का जनक करार देते हुए कहा था ‘अल्लाह ने पाकिस्तान राष्ट्र की दुआ कबूल कर ली है। उसे हमारी स्थिति पर तरस आ गया और उसने यह करिश्मा कर दिखाया। इस उपलब्धि के लिए डॉ. अब्दुल कदीर खान को उसने चुना। डॉ. कदीर वह शख्स हैं जिन्होंने अकेले दम पाकिस्तान को परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्र बना दिया।’ इस लिहाज से देखें तो ईरान एक आधुनिक इस्लामिक राष्ट्र है जिसकी अवाम शिक्षित और राजनीतिक स्तर पर जागरूक युवा है। दूसरी तरफ पाकिस्तान नाकाम राष्ट्र होने की कगार पर खड़ा हुआ एक इस्लामिक राष्ट्र है। उसके धार्मिक स्कूल यानी मदरसे पश्चिमी देशों के खिलाफ जेहाद छेड़ने वाले केंद्र के रूप में ख्यात हैं।
ऐसे हालात में आज सामयिक प्रoA यह उठता है कि क्या इस्लामाबाद प्रशासन अंततोगत्वा सुधार की गुंजाइश वाले मोड़ से आगे बढ़ चुका है? बीते मार्च में इस्लामाबाद की यात्रा के दौरान मैंने पाया कि पाकिस्तान के सुशिक्षित उच्च वर्ग के लिए तालिबान द्वारा देश की बागडोर संभालने की संभावनाएं दूरस्थ सीमावर्ती क्षेत्रों में चल रहे आतंकियों के प्रशिक्षण शिविर सरीखी ही थीं। हालांकि सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस की बर्खास्तगी के बाद हुए उग्र प्रदर्शन के दौरान प्रयोग में लाई गई आंसू गैस से वे रोमांचित हो उठेथे। उस वक्त फिजाओं में जो तनाव था वह लोकतंत्र से जुड़ा हुआ था, न कि आतंकवाद से।
अगर देखा जाए तो पाकिस्तान की राजनीतिक स्थिति कोई सामान्य स्थिति नहीं है। आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक युद्ध में बुश प्रशासन मुशर्रफ को अमेरिका समर्थक के तौर पर महत्व देता है। पाकिस्तान का उच्च वर्ग, जो अब बेनजीर भुट्टो के साथ है, अपनी भावनाओं को स्पष्ट तौर पर व्यक्त कर सकता है। वह मुशर्रफ के सैन्य शासन को लोकतंत्र के खिलाफ गंभीर अपराध की नजर से देखता है। दूसरी तरफ तालिबान समर्थक मुशर्रफ की सीमांत क्षेत्रों में सैन्य नियंत्रण की कोशिशों को इस्लाम के लिए बड़ा खतरा मान कर चल रहे हैं। फिर पाकिस्तानी सेना, खासकर उसकी खुफिया इकाई आईएसआई मानती है कि पाकिस्तान के लिहाज से सही नीतियों को अफगानिस्तान में अमली जामा पहनाने के लिए सैन्य आवरण की दरकार है। खासकर तालिबान को संगठित करने के काम के लिए।
इस सिलसिले के मद्देनजर एक मैक्सिकन गतिरोध से जुड़ा किस्सा याद आ रहा है। आमने-सामने खड़े दो शत्रु समूह एक-दूसरे पर बंदूक तो ताने रहे लेकिन गोली किसी ने भी नहीं चलाई, क्योंकि दोनों में से किसी को भी नहीं पता था कि जीत किसकी होगी। ऐसे में आने वाले दिनों में पता चल जाएगा कि मुशर्रफ पहली गोली कब चलाते हैं। ऐसी स्थिति में भी अमेरिका हाथ पर हाथ धरे उन्हें देखने के सिवाय और कुछ भी नहीं कर पाएगा। ऐसे में मुशर्रफ की रणनीतिक विजय से पाकिस्तान का जार-जार हो चुका लोकतांत्रिक ताना-बाना और कमजोर ही होगा। नतीजतन, अव्यवस्था और धरना-प्रदर्शन का जोर तेज होगा।
यदि मुशर्रफ सैन्य शासन के विपरीत जाने वाले कदम उठाते हैं तो लोकतंत्र समर्थक अवाम तो खुश होगी लेकिन उनकी सेना के जनरल और अन्य सिपहसालारों का धैर्य जवाब दे जाएगा। ऐसे में वे सैन्य स्तर पर और सक्रियता से काम लेंगे। यानी लोकतंत्र समर्थक आंदोलन हो या आक्रामक सैन्य हस्तक्षेप, दोनों ही से अव्यवस्था फैलनी लाजिमी है। ऐसी कोई भी स्थिति मुस्लिम आतंकियों के हित में ही होगी। साथ ही इससे सीमांत मोर्चे पर आतंकी वारदातों पर नियंत्रण के लिए आवश्यक दृढ़ता के मोर्चे पर भी कमजोरी पनपेगी। बद से बदतर कल्पना की जाए तो तालिबान सरीखा आंदोलन सड़कों पर आतंक और उपद्रव मचाता हुआ येन-केन प्रकारेण परमाणु हथियारों समेत राष्ट्रपति निवास पर भी कब्जा जमा लेगा। और, यह सब उस देश में होगा जिसकी आबादी अमेरिका की कुल जनसंख्या की आधी होगी। इराक में हताश हो चुके अमेरिकी सैनिकों के लिए इस विशालकाय जनसमूह पर हमला बोलना आसान नहीं होगा।
पाकिस्तान में मौजूद खतरे की इस खतरनाक सच्चई के आलोक में अमेरिकी राष्ट्रपति पद की बहस में दावेदार अब ईरान से युद्ध की चर्चा को भूल जाएंगे। बुश प्रशासन ने बार-बार यही जताया है कि अमेरिकियों को किससे डरना है इस बाबत सारे पत्ते उसके हाथ में रहते हैं लेकिन यथार्थ के धरातल पर जहां लोग प्रदर्शन कर मौत को गले लगा रहे हों, जहां नाभिकीय हथियारों पर नियंत्रण अनिश्चित हाथों में हो, उस पाकिस्तान रूपी खतरे की विकरालता कल के ईरान से कहीं अधिक है। आज तो अमेरिकी हितों के लिए इस फानी दुनिया में सबसे बड़ा खतरा पाकिस्तान ही है।
-लेखक कोलंबिया विश्वविद्यालय में इतिहास के प्रोफेसर और इस्लाम: द व्यू फ्रॉम द एज के लेखक भी हैं।