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Chhattisgarh
Bilaspur Bilaspur जांजगीर.
भगवान राम के विरह में माता कौशल्या ने जिस तरह 14 साल बिताए, वैसा ही हाल 66 वर्षीय वृद्धा धनकुंवर सूर्यवंशी का है।
जिला मुख्यालय से 5 किलोमीटर दूर स्थित गांव सुकली की जनसंख्या 21 सौ है। गांव के सभी मकानों में रंग-रोगन व सजावट की गई है। वहीं धनकुंवर की झोपड़ी को देखकर ही दीवाली के प्रति उसकी नीरसता का एहसास हो रहा है। दीवाली के लिए गांव के सभी लोग उत्साहित हैं, पर माता चौरा मोहल्ला निवासी धनकुंवर की दीवाली तो तभी मनेगी जब उसकी आंखों का तारा मेलूराम सूर्यवंशी उर्फ डैनी घर लौटेगा। बेटे व नाती-पोतों के इंतजार में उसकी आंखें पथरा गई हैं। हर आहट उसे अपने पुत्र की लगती है।
बूढ़ी काया पुत्र वियोग का दर्द सीने में दफन किए आती-जाती सांसों के साथ बेटे व पोतों के इंतजार में घर की देहरी पर आस लगाए बैठी है। धनकुंवर ने बताया कि उसके दो पुत्र व दो पुत्रियां हैं। बड़ा पुत्र फेंकूलाल पहले ही घर से अलग हो गया था। दो पुत्रियों की शादी हो गई है। छोटा बेटा डैनी उसका लाड़ला था, जो उसके साथ ही रहता था। वह पत्नी व दो बच्चों के साथ कमाने-खाने हिमाचल प्रदेश गया, तो वहीं का होकर रह गया।
7 साल से नहीं मनाई दीवाली
7 साल पहले डैनी कमाने-खाने बाहर गया, उसके बाद से धनकुंवर ने दीवाली नहीं मनाई। उसका कहना है कि डैनी के जाने के बाद किसी त्योहार का उत्साह नहीं रहा। इस बीच पति बिसाहू प्रसाद का भी 3 साल पहले निधन हो गया, ऐसे में उसका रहा-सहा सहारा भी छिन गया। जब तक डैनी था, सभी मिलकर दीवाली में खुशियां मनाते थे। डैनी अपने एक बेटे रोशन कुमार को धनकुंवर के पास छोड़ गया था, जो अब 14 साल का है। उसकी खुशी के लिए धनकुंवर दीवाली पर घर में एक-दो दिए जला देती है। उसका कहना है कि भगवान राम के वनवास से अयोध्या लौटने पर दीवाली मनाई गई थी। जब उसका बेटा डैनी वापस घर लौटेगा, तभी वह उसके साथ दीवाली मनाएगी।
बंधक बना लिया गया था डैनी
7 साल पहले डैनी कमाने-खाने हिमाचल प्रदेश गया था। घठोली निवासी अपने बहनोई नारायण प्रसाद को उसने फोन पर बताया था कि ईंट भट्ठा मालिक ने उसे बंधक बना लिया है। पिता की मौत से भी वह बेखबर था। ग्रामीणों ने बताया कि 3 साल पहले डैनी दो दिन के लिए गांव आया तब उसने बताया था, कि सरदार ने उसके परिवार को भट्ठा मालिक के पास बेच दिया है। आषाढ़ तक पूरा पैसा छूट जाएगा, तब वह सपरिवार गांव आएगा। साल भर पहले डैनी फिर से गांव आया, तो उसने बताया था कि वह बंधक से मुक्त हो गया है। बंधकमुक्त होने के बाद भी पुत्र का घर न लौटना बूढ़ी मां की समझ से परे है।
भीख मांगनी पड़ी
धनकुंवर की माली हालत पहले से ठीक नहीं थी। एक मिट्टी के झोपड़े के अलावा उसके पास कुछ भी नहीं। वह बताती है कि उसके पति व डैनी की कमाई से घर चलता था। डैनी बाहर चला गया। पति बिसाहू प्रसाद के रहते तक उन्होंने जैसे-तैसे घर चलाया। 3 साल पहले बिसाहू की मौत के बाद पोते रोशन व खुद के पेट की आग बुझाने उसे भीख तक मांगनी पड़ी। 3 साल तक दो वक्त की रोटी के लिए उसने लोगों के सामने हाथ फैलाए। अंतत: पंचायत को उसकी दशा पर रहम आया और पिछले 5 महीने से उसे 3 सौ रुपए वृद्धा पेंशन मिल रही है।