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बारहमासी दीवाली की कामना

परदे के पीछे.हमारी उत्सवप्रियता के कई कारण हो सकते हैं। आनंद के प्रति हमारा सहज झुकाव है और यथार्थ को नकारने या उससे दूर भाग जाने की भी हमारी प्रवृत्ति रही है। हमारे लिए उत्सव मां की गोद की तरह है, जिसमें बैठकर हम चिंता से मुक्त हो जाते हैं। बाजार की ताकतें हमारी उत्सवप्रियता को बढ़ावा देती हैं, क्योंकि इसमें उनका लाभ है। मनोरंजन उद्योग भी इसी उत्सवप्रियता और पलायन पर टिका है। जुए के प्रति हमारा आग्रह भी हमें उत्सव की ओर ले जाता है।

हर कालखंड में बाजार महत्वपूर्ण रहा है, परंतु इस दौर में बाजार ने ताम-झाम भरी दुकानों के साथ ही खरीदार भी पैदा किए हैं। जीवन के लिए आवश्यक चीजों की खरीद से ज्यादा मुनाफा बाजार को कम आवश्यक या अनावश्यक चीजों की बिक्री से होता है। बाजार और प्रचार उद्योग ने ऐसा मायाजाल रचा है, जिसे जलसाघर समझकर लोग जा रहे हैं। खरीदने वाला और बेचने वाला दोनों ही खुश हैं। अत: किसी को बीच में आने की जरूरत नहीं है।

अपनी उत्सवप्रियता को बारहमासी बनाने के लिए हम डिज्नी स्टूडियो के तौर पर बाजार में एक दीवाली कक्ष, एक होली कक्ष की रचना कर सकते हैं। अर्थात उस क्षेत्र में दीवाली का वातावरण सारे वर्ष रहेगा और जीवन की आपाधापी से तंग मनुष्य किसी भी मौसम में चंद घंटों के लिए दीवाली के मजे ले सकता है या रंग में सराबोर हो सकता है। डिज्नी स्टूडियो में एक क्रिसमस मोहल्ला है, जहां सारे समय त्योहार का वातावरण रहता है और नकली बर्फ भी बरसती है।

हॉलीवुड में एक फिल्मी बनी थी, जिसका केंद्रीय पात्र एक बच्चा है और लाइलाज बीमारी से जूझते हुए वह क्रिसमस तक अवश्य जीना चाहता है परंतु डाक्टर जानते हैं कि आठ महीने उसके लिए असंभव हैं। मोहल्ले के सारे लोग एक खास इतवार मुकर्रर करके पूरे मोहल्ले को क्रिसमस के अनुरूप सजाते हैं। इतना ही नहीं, वे क्रिसमस की भावना को अपने हृदय में जगाते हैं और उपहार भी लिए-दिए जाते हैं। मोहल्ले में एक फिल्म वाला स्टूडियो से नकली बर्फ बरसाने की मशीन ले आता है। मोहल्ले के चर्च को भी सजाया जाता है और पादरी भी इसमें पूरी भावना से शिरकत करते हैं। इस तरह उस मासूम बच्चे की इच्छा पूरी होती है। शायद इसी फिल्म से प्रेरित होकर डिज्नी ने क्रिसमस को बारहमासी किया है।

शेयर बाजार पच्चीस हजार के जादुई अंक की ओर जा रहा है। मानसून की कृपा से फसल भी अच्छी है और अब कम रुपयों में डॉलर भी मिल रहा है। इस शाइनिंग इंडिया की अंतड़ियों में गरीबी और साधनहीनता से संघर्षरत भारत की किसी को फिक्र नहीं है। सच तो यह है कि इस भारत के पास भी उत्सवप्रियता का माद्दा है और वह भी अपने ढंग से वैभव के इस विराट स्वांग में शामिल है और क्यों नहीं हो, क्योंकि आनंद पर किसी का एकाधिकार नहीं है। शायद आनंद अवाम के हिस्से में साधन-संपन्न लोगों से ज्यादा ही आया है। प्रकृति के संतुलन के निराले तरीके हैं।

एक वास्तविक संसार है और एक उसकी कल्पना है। माया भी है और मायाजाल भी है। तमशा भी है, तमाशबीन भी है। आज वैकल्पिक संसार यथार्थ संसार पर भारी पड़ रहा है और हमें कभी-कभी लगता है कि भ्रम ही सत्य है। इस खुशनुमा माहौल में बारहमासी दीवाली की कल्पना आज आपको असंभव लगती है, परंतु कल कोई समर्थ और चतुर व्यापारी बाजार में हर मौसम में मनाई जाने वाली दीवाली रच ही लेगा और हम यथार्थ को नकारने वाले लोग वहां जब जी चाहे, जाकर दिए जलाएंगे, पटाखे फोड़ेंगे और रोशनी में नहाएंगे। आनंद का हमारा माद्दा सीमाहीन है।

याद आती है आलोक श्रीवास्तव के कविता संग्रह ‘आमीन’ में छपी पहली कविता जो संगनन अंगिरस का अनुवाद है: ऋग्वेद 10-191-2-4 से

हम साथ चलें, संवाद करें

सब मिलकर विराट मन रचें

पूर्व काल में देवगण ज्यों

ग्रहण करते ये यज्ञ की हवि

वैसे ही सब मिलित भाव से

धरती की संपदा का करें उपयोग

सबका हो एक ही आदर्श

सबके हृदय हों अभिन्न

हर मन में स्पंदित हो एक भाव

सब मिलें, सुंदर रूप में एक साथ।





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