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‘सावरिया’ : कहानी की आत्मा कहीं खो गई

फिल्म समीक्षा : ‘सावरिया
निर्देशक : संजय लीला भंसाली
लेखक : प्रकाश कपाड़िया और संजय लीला भंसाली
संगीत : मोंटी
गीत : समीर
फोटोग्राफी : रवि के चंद्रन
कलाकार : रणबीर कपूर,सोनम कपूर,सलमान खान,रानी मुखर्जी

क्या कोई ऐसी फिल्म हो सकती जिसमें आपको नायक ,नायिका का अभिनय और फिल्म की भव्यता भरी फोटोग्राफी पसंद हो और उसके बाद भी फिल्म देखने के बाद आप अपने आपको ठगा हुआ सा पाएं? जी हां बिल्कुल ऐसा हो सकता है अगर आप ‘सावरिया’ फिल्म देखने जाएं तो। कहा जाता है कि संजय लीला भंसाली के दिल में प्यार की भावनात्मक रूह एक देवदास के रूप में मौजूद है। एक बात और प्यार का ज्वार भाटा जब आता है तो उसका असर लंबे समय तक दिखता है और उसकी एक दास्तान बन जाती है। लेकिन ‘सावरिया’ जैसी बड़ी फिल्म में ऐसा लगता है कहानी की आत्मा कहीं खो गई और प्यार की तीव्रता और और ज्वार भाटे के खालीपन से फिल्म की स्टोरी लाईन जैसे बुझे हुए चिराग की तरह हो गई।

फिल्म की पटकथा के साथ प्रकाश कपाड़िया और संजय लीला भंसाली न्याय नहीं कर सकें है और बची कुची कसर गानों की अधिकता ने पूरी कर दी है।खैर कहने को यह रूस के मशहूर लेखक फायडोर दोस्तवस्की की लघुकथा व्हाइट नाइट पर आधरित है।

फिल्म का नायक रणबीर राज अपने अकेलेपन में जी रहा है लेकिन उसके मासूम से दिल में हलचल तब शुरू होती है जब उसकी पहली मुलाकात शर्मीली सकीना से होती है जो अक्सर एक पुल पर काली छतरी लिए किसी का इंतजार करती रहती है।दरअसल सकीना को ईमान नाम के एक दूसरे इंसान से प्यार रहता है और राज को वह अपना दोस्त मानती है और राज तो बांवरापन लिए बस सकीना के नाम की माला जपता है। इस प्रेम त्रिकोण में एक चौथा कोना भी है जहां प्रेम तो है पर उसकी अभिव्यक्ति नहीं और यह प्रेम है गुलाबो के दिल में जो रेड लाईट इलाकें में रहती है । भंसाली की फिल्म में प्यार की गहराई और उसके ज्वार भाटे की जानकार गुलाबो सावरियां फिल्म में सूत्रधार के रूप में है जो नायक के लिए पथप्रदर्शक का काम करती है ।

SONAM KAPOORफिल्म में रणबीर राज कपूर और सोनम कपूर का अभिनय शानदार है और इसका पूरा श्रेय निर्देशक संजय लीला भंसाली को दिया जा सकता है। रणबीर राज कपूर के रूप में बॉलीवुड को एक ऐसा कलाकार मिल गया है जिसमें रोमांटिक हीरो बनने के साथ ही चेहरे पर भावनत्मक अदायगी का मिश्रण का होना उनकों बुलंदी पर ले जा सकता है। वहीं सोनम का अभिनय बेजोड़ है और वे सिने जगत का रहस्मयी आकर्षण बन सकती है क्योंकि इस काली छतरी वाली लड़की (सोनम कपूर) के पास खूबसूरत जिस्म ,सादगी युक्त चेहरा और आंखों की चंचलता में मदहोश कर देने वाला जादू है।सलमान ने ईमान की संक्षिप्त भूमिका में और रानी ने गुलाबो की भूमिका में पूरा न्याय किया है।

फिल्म के सेट और वेशभूषा आला दर्जे के है और रवि के चंद्रन ने फिल्म की सिनेमैटोग्राफी में गजब का काम किया है जिसकी जितनी भी तारीफ की जाए कम है। फिल्म को भव्यता देने में सिनेमैटोग्राफी का बड़ा योगदान है। शायद ही कोई ऐसा दर्शक होगा जो फिल्म देखने के बाद फिल्म की सिनेमैटोग्राफी से प्रभावित न हो। अगर फिल्म की लंबाई और गीतों की अधिकता कम होती, साथ ही प्यार का ज्वार भाटा तीव्रता के उफान पर होता तो शायद दर्शक बाहर निकलने के बाद कहानी को याद रखता , न की काली छतरी वाली लड़की और उस पुल को।

वैसे दिन के उजाले में काली छतरी वाली लड़की को देखना रोमांचक अनुभव हो सकता है ,बस कहानी के बारें में ज्यादा न सोचे तो। वैसे भी बॉलीवुड में उधार की कहानियों से काम चल रहा है। इसलिए इस खतरनाक समय में ज्यादा कुछ पाने से बचें तो हाजमा बेहतर रहेगा और आप फिल्म की नायिका की तरह खुशी खुशी थियेटर से बाहर निकल सकतें है।





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uday
Sunday, 11th Nov 2007, 21:03
this review is good, but film is totally flop.And hero ranbir kapoor is not to good.