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Indians Abroad Indians Abroad लंदन. ब्रिटेन में हजारों भारतीय डॉक्टरों ने बड़ी कानूनी लड़ाई जीत ली है। हाईकोर्ट ने सरकार के उस नस्लीय भेदभावपूर्ण फैसले को अवैध करार दिया है, जिसके
तहत नेशनल हेल्थ सर्विस में नियुक्ति के मामले में ब्रिटिश और यूरोपीय देशों के डॉक्टरों को प्राथमिकता देने का प्रावधान किया गया था।
सरकार के फैसले को ब्रिटिश एसोसियशंस ऑफ फिजिशियंस ऑफ इंडियन ऑरिजिन (बीएपीआईओ) ने कोर्ट में चुनौती दी थी। करीब 16 महीने तक चली कानूनी जंग के बाद शुक्रवार को हाईकोर्ट की तीन सदस्यीय बेंच ने भारतीय डॉक्टरों के हक में फैसला सुनाया। बेंच ने टिप्पणी की कि ऐसा निर्देश देते वक्त गृह विभाग ने यह आकलन तक नहीं कराया कि नस्लीय आधार पर इसका क्या असर पड़ेगा।
क्या मामला था :
* पिछले साल अप्रैल में जारी निर्देश के मुताबिक यूरोपीय संघ के बाहर के देशों के डॉक्टरों को वर्क परमिट फ्री वीजा जारी करने पर रोक लगा दी गई थी।
* नेशनल हेल्थ सर्विस में नियुक्ति के लिए मेडिकल ग्रेजुएट्स की दो सूचियां बनाए जाने का प्रावधान किया गया था।
* इसके तहत पहली सूची ब्रिटेन और यूरोपीय संघ के देशों के नागरिकों की होगी, जबकि दूसरी सूची में भारतीय और अन्य विदेशी डॉक्टर होंगे।
* भारतीय और अन्य विदेशी डॉक्टरों के नामों पर विचार तभी किया जाएगा,जब पहली सूची पूरी होने के बाद भी पद खाली रह जाएंगे।
* इस निर्देश से ब्रिटेन में गैर यूरोपीय देशों के 16,000 डॉक्टरों के भविष्य पर तलवार लटक गई थी। इनमें से ज्यादातर डॉक्टर भारतीय थे।
क्या है कोर्ट के फैसले का मतलब : हाईकोर्ट के फैसले के बाद भारत और अन्य देशों के मेडिकल ग्रेजुएट्स हाई स्किल्ड माइग्रेंट प्रोग्राम (एचएसएमपी) वीजा के तहत 2008 में पोस्ट ग्रेजुएट ट्रेनिंग पदों पर नियुक्ति के मामले में ब्रिटिश और यूरोपीय संघ के देशों के नागरिकों से योग्यता के आधार पर प्रतिस्पर्धा कर सकेंगे। उनसे कोई भेदभाव नहीं किया जाएगा।
* ‘यह गैर यूरोपीय डॉक्टरों के लिए ऐतिहासिक जीत के समान है।’
- डा. सतीश मैथ्यू, वाइस चेयरमैन, बीएपीआईओ
* ‘यह फैसला निराशाजनक है। करदाताओं को सोचना पड़ेगा कि वे गैर यूरोपीय डॉक्टरों की ट्रेनिंग पर पैसा खर्च क्यों होने दें।’
- प्रवक्ता, स्वास्थ्य विभाग