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Astro Speak Astro Speak ग्रह चाल. ज्योतिष शास्त्र में संतान उत्पत्ति के विविधि योगों का विश्लेषण किया गया है। धर्मशास्त्र एवं ज्योतिषशास्त्र में ऋतुकाल की सोलह रात्रियों को गर्भाधान के
योग्य माना गया है, उनमें भी प्रारंभिक चार रात्रियों का निषेध किया गया है। बाद की बारह रात्रियों में से छह, आठ, दस, बारह, चौदह एवं सोलहवीं रात्रि में गर्भाधान पुत्र संतान प्रदान करता है।
ऋतुकाल की चतुर्थ रात्रि से सोलह रात्रि तक गर्भाधान से उत्पन्न होने वाली संतान के विषय में कहा गया है कि इन रात्रियों में गर्भाधान से उत्पन्न संतान क्रमश: अल्पायु पुत्र, कन्या, वंश का वृद्धिकर्ता पुत्र, वंध्या कन्या, पुत्र, सौंदर्यवती कन्या, प्रभावशाली पुत्र, कुरूप कन्या, धनी पुत्र, पापचारिणी कन्या, धर्मात्मा पुत्र, श्री संपन्न कन्या तथा सर्वज्ञ पुत्र होता है। इसके अलावा पुत्र एवं पुत्री उत्पत्ति के पृथक-पृथक योगों की चर्चा भी ज्योतिषशास्त्र में की गई है।
गर्भाधान के समय विद्यमान लग्न के आधार पर पुत्र उत्पत्ति के योगों के विषय में कहा गया है कि लग्न से तृतीय, पंचम अथवा नवम में सूर्य हो तो पुत्र संतान होती है। यदि लग्न से तृतीय, पंचम, नवम में सूर्य और लग्न में शुभग्रह की दृष्टि हो तो उत्पन्न संतान भाग्यशाली, बुद्धिमान एवं दीर्घायु होती है।
इसके अतिरिक्त विषम राशि में, पुरुष नवांश में बली गुरु, लग्न, सूर्य व चंद्रमा हों तो पुत्र संतान एवं सम राशि में सम नवांश में ये ही ग्रह एवं लग्न हों तो पुत्री संतान होती है। यदि गुरु, लग्न, सूर्य व चंद्रमा सभी ओज (विषम) राशि में न हों अथवा सम राशि में न हों तो बाहुल्य किसका है, यह देखकर निर्णय करना चाहिए।
यदि पुरुष राशि (विषम) में सूर्य, बृहस्पति हों तो पुत्र एवं चंद्रमा, शुक्र एवं मंगल सम राशि में हो तो कन्या संतान होती है। सूर्य व गुरु यदि विषम भावों में हों तो पुत्र और यदि सम भावों में हों तो कन्या संतान होती है। यदि मंगल सम भावों में हो तो पुत्री और विषम भावों में हो तो पुत्र संतान होती है।
ये ग्रह यदि द्विस्वभाव राशि में हों तो जुड़वां संतान के योग बनाते हैं। यदि ये ग्रह मिथुन, धन नवांश में हों तो दो पुत्र और कन्या मीन नवांश में हों तो दो पुत्री के योग बनते हैं। यदि सूर्य गुरु, मिथुन, धनु के नवांश में बुध से दृष्ट होते हैं तो दो पुत्र एवं यदि चंद्र शुक्र, कन्या व मीन के नवांश में हो तो कन्या के योग बनते हैं। यदि ये दोनों स्थितियां संभव हों तो एक पुत्र, एक पुत्री के योग बनते हैं।
यदि गर्भाधान के समय की ग्रहस्थिति में इन योगों का अभाव हो तो शनि की स्थिति के आधार पर निर्णय लेना चाहिए। शनि लग्न के अतिरिक्त अन्य विषम (3, 5, 7, 9,11 ) भावों में हों तो पुत्र अन्यथा कन्या जन्म का कारक होता है। बुध समभावों में कन्या संतान प्रदान करता है।
संतान जन्म संबंधी एकाधिक योगों में जो बली हों, उसी के आधार पर निर्णय करना चाहिए। यदि गर्भाधान कालीन कुंडली उपलब्ध न हो तो प्रश्न कुंडली से भी इन्हीं योगों का
विचार कर निर्णय किया जा सकता है। इस प्रकार संतान उत्पत्ति से पूर्व ही होने वाली संतान के विषय में जाना जा सकता है, मगर फलादेश करते समय सभी योगों का सूक्ष्म विश्लेषण आवश्यक है। इन ज्योतिषीय उपायों से गर्भपात एवं भ्रूण हत्या जैसी स्थितियों से स्वयं को बचाकर हम भारतीय संस्कृति की परंपरा को अक्षुण्ण रख सकते हैं। इस तरह ज्योतिष के ज्ञान का उपयोग करके व्यक्ति आने वाली संतान के स्वागत के लिए खुद को तैयार कर सकता है।
लेखिका जयपुर में भाषाविज्ञान की प्रोफेसर हैं।