|
साल्हावास (झज्जर) गांव मोहनबाड़ी में लोग परंपरागत रूप से वर्षो से ऊंट पाल रहे हैं, किंतु वे ऊंट की सवारी नहीं करते। इसी प्रकार गांव में महिलाएं दोघड़ (सिर पर दो मटके) भी नहीं उठातीं। इसके अलावा गांव में होलिका दहन भी नहीं होता। यह परंपराएं कब से चली आ रही हैं, इनके बारे में किसी भी ग्रामीण को सही वर्ष का ज्ञान नहीं है।
गांव के पूर्व सरपंच हरिचंद दलाल ने बताया कि उनके बुजुर्ग बताते थे कि घर की चारदीवारी में काम करने वाली बहू-बेटियों को बाहरी व्यक्ति न देख सकें, इसके लिए गांव में ऊंट की सवारी की मनाही हुई थी। पहले घरों की दीवारों की ऊंचाई कम होती थी। जिसके कारण ऊंट पर सवार व्यक्ति आसानी से तांक-झांक कर सकता था।
बीमारी से बचने का टोटका :
गांव की महिला भतेरी देवी ने बताया कि वर्षो पहले गांव में कोई बीमारी फैल गई थी। जिसके अनिष्ट को समाप्त करने के लिए गांव में महिलाओं ने दोघड़ (सिर पर दो मटके) उठाने बंद कर दिए थे।
होलिका दहन नहीं होता : ग्रामीण कर्ण सिंह ने बताया कि गांव में होलिका दहन नहीं होता। वर्षो पहले गांव के होली के दिन होलिका दहन के दौरान आग लगने के कारण उसके बाद से गांव में होलिका दहन बंद कर दिया गया था। भले ही गांव में होलिका का दहन न हो लेकिन सभी त्यौहार हषरेल्लास से मनाए जाते हैं।