अभिमत. प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की 28 घंटे की संक्षिप्त रूस यात्रा के दौरान दोनों परंपरागत मित्र देशों के बीच पहले जैसी गर्मजोशी का नजर नहीं आना एक धुरी वाली दुनिया में राजनय की बदलती प्राथमिकताओं का द्योतक है।
प्रधानमंत्री की इस यात्रा के दौरान रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ हुई ढाई घंटे की उनकी सालाना शिखर बैठक एक तरह से रस्म अदायगी भर थी तथा इस दौरान हुए चार समझौतों में से एक भी ऐसा नहीं है जिसे मील का पत्थर करार दिया जा सके। दोनों देशों की ओर से बयानों के स्तर पर रिश्तों में गर्मजोशी में आई कमी को ढांकने की कोशिश जरूर की गई पर व्यावहारिक स्तर पर इसे साबित नहीं किया जा सका।
रूस की तरफ से गर्मजोशी में कमी आने के ऐतिहासिक तथा व्यावहारिक कारण हैं। 1971 में हुई शांति संधि के समय 60 साल के भारत-रूस संबंधों की प्रगाढ़ता चरम पर थी। उस दौर में रूस कम्युनिस्ट चीन के मुकाबले भारत को तरजीह देता था। अस्सी के दशक के उत्तरार्ध में मिखाइल गोर्बाचेव ने इस नीति को बदला और भारत की तुलना में चीन को प्राथमिकता देना शुरू किया।
गोर्बाचेव के बाद येल्तसिन और फिर पुतिन ने भी यही राह पकड़ी। संभवत: रूस को लगता है कि बाजारवाद और उदारीकरण के दौर में अमेरिका के प्रति भारत का झुकाव क्रमश: बढ़ता जा रहा है। उसकी यह भी शिकायत हो सकती है कि तमाम रक्षा सौदों में भी भारत उसे पहले जैसी तरजीह नहीं दे रहा है।
ऐसे में भारत को रूस को यह समझाना होगा कि दोस्ती और बाजार दो अलग बातें हैं। इन्हें एक-दूसरे के आड़े नहीं आने देना चाहिए। याद रहे कि सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्यों में रूस ही अकेला देश है जो आड़े वक्त में हमारे साथ खड़ा रहा है और कश्मीर मामले में उसके वीटो ने ही हमारी लाज बचाई है। उसके साथ हमारे संबंधों में किंचित भी ठंडापन आना भविष्य के लिए शुभ संकेत नहीं है।