आलेख.
आज हर कोई गुजरात के बारे में ताजा खबर कुछ इस अंदाज में जानना चाहता है मानो वहां दिन-प्रतिदिन राजनीतिक नजारा बदल रहा हो। चुनावी सर्वेक्षकों ने कोई महीने भर पहले बताया था कि नरेंद्र मोदी अपने विरोधियों से खासे आगे चल रहे हैं। सर्वेक्षण के इस परिणाम से मोदी विरोधियों(जिनमें उग्र सांप्रदायिक तत्वों से लेकर खांटी धर्मनिरपेक्ष ताकतें तक शामिल हैं) का मन बुझ सा गया था।
सवाल यह है कि क्या गुजरात में तकरीबन पच्चीस-तीस दिन बाद भी स्थिति वही है? या जमीन बदलने लगी है? तब से अब तक करीब तीन परिवर्तन तो निश्चित रूप से हुए हैं- पहला, बिरादरी के स्तर पर पाटीदारों(पटेलों) के नेताओं ने मोदी के खिलाफ कांग्रेस के पाले में जाने का पक्का फैसला कर लिया है। पहले समझा जा रहा था कि अरुण जेटली के राजनीतिक कौशल की मदद से गुजरात भाजपा उसके एक बड़े असंतुष्ट हिस्से को अपने पक्ष में दोबारा जीत लेगी।
दूसरा, कोली समाज का मोदी विरोधी असंतोष अपनी अभिव्यक्तियों में सरकार विरोधी मुकाम पर पहुंच गया है। तीसरा, आदिवासियों का कांग्रेसपरस्त रुझान पहले के मुकाबले अधिक मुखर हो गया है। जबकि मोदी के राजनीतिक प्रबंधकों का दावा था कि वे जनजातियों में जमीन के वितरण का श्रेय लेकर रहेंगे और इस मामले में कांग्रेस को प्रतियोगिता में परास्त कर देंगे।
इन तीन परिवर्तनों की रोशनी में देखें, तो गुजरात में मोदी को मिली चुनावी बढ़त पहले के मुकाबले घटी हुई प्रतीत होने लगेगी। आखिरकार पटेल, कोली और आदिवासी मिलकर गुजराती वोटरों के साठ फीसदी का निर्माण करते हैं, पर मोदी के पास इसका भी जवाब है। हाल ही में उन्होंने कहा है कि गुजरात में जाति और समुदाय का असर नहीं चलता। वहां तो प्रश्न गुजराती अस्मिता का है और इस बार चुनाव में वही चलेगी।
दरअसल, गुजरात की राजनीति पिछले दस साल से मनमोहन देसाई की फिल्मों जैसी हो गई है जिनकी गैर-गंभीर समझी जाने वाली फिल्मों के हर सीन में क्लाइमेक्स होता था। आज देसाई के गृहप्रांत का राजनीतिक घटनाक्रम भी अपनी पूरी गंभीरता के साथ क्लाइमेक्स दर क्लाइमेक्स का एक सिलसिला बनाता हुआ दिख रहा है।
इस फिल्म की शुरुआत शंकर सिंह वाघेला के नेतृत्व में हुए हजूरियों(सरकारी पक्ष के विधायक) के खिलाफ खजूरियों(खजुराहो में प्रवास करने वाले असंतुष्ट विधायक) की नाटकीय बगावत से हुई थी। दूसरा क्लाइमेक्स अगर भारतीय जनता पार्टी में विभाजन का था, तो तीसरा केशुभाई की जगह नरेंद्र मोदी के मुख्यमंत्री बनने के रूप में सामने आया। उसके बाद फिर गोधरा हुआ।
फिर राज्य की शह से अल्पसंख्यकों का नरसंहार किया गया और गुजरात को सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की प्रयोगशाला(तोगड़िया के शब्दों में धर्मनिरपेक्षता की कब्रगाह) बनाकर चुनाव में अभूतपूर्व जीत हासिल की गई। फिर अचानक सीन बदला और हिंदू हृदय सम्राट बनकर मुख्यमंत्री की कुर्सी पर विराजने वाले नरेंद्र मोदी गुजराती अस्मिता के रचनाकार बनते नजर आए। इसी अस्मिता की खातिर उन्होंने विकास पुरुष का चोला पहन लिया है और वे सांप्रदायिक हिंसा के बारे में बात करना भी पसंद नहीं करते।
मोदी ने अपनी छवि में यह बदलाव धीरे-धीरे योजनापूर्वक किया है। भाजपा के अंदरूनी दायरे में भी जिन्ना प्रकरण पर वे आडवाणी के साथ रहे और संघ परिवार के बजरंगदलियों और हिंदू परिषदियों से खुद को इस हद तक अलग कर लिया कि ये अतिवादी तत्व आज उनके खिलाफ खड़े हुए हैं। अपने इस लाजवाब रूपांतरण से मोदी ने उस मीडिया का ध्यान नए सिरे से अपनी ओर खींचने में कामयाबी हासिल की है, जो सन् 2002 के खूनी खेल के दौरान पूरी तरह उनके खिलाफ हो गया था।
देखा जाए तो मीडिया भी पिछले कुछ दिनों से मोदी के इस प्रयास में भागीदार बनता हुआ लग रहा है। मोदी के आश्वस्तिकारक इंटरव्यू प्रसारित-प्रकाशित किए जा रहे हैं। उनका पाठ किसी भी उदारवादी सेकुलर नेता को मुदित कर देने के लिए काफी है, बशर्ते वह सन् 2002 का रक्तरंजित इतिहास भुला दे।
मोदी का तर्क इस मायने में सही है कि अगर कोई गुजराती अस्मिता वास्तव में बन गई है तो वह मुख्यमंत्री को उनके विरोधियों के मुकाबले कम से कम इतनी बढ़त पर बनाए रखेगी कि जातिगत संरचनाओं से परे जाती हुई पटेलों, कोलियों और आदिवासियों के वोटों में हुई कटौती की भरपाई कर दे।
इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि इस क्षेत्रीय अस्मिता में मुसलमान शामिल हैं या नहीं। अगर यह अस्मिता केवल एक हिंदू अस्मिता है, तो भी यह मोदी को लगातार तीसरी बार मुख्यमंत्री बनाने के लिए काफी होगी। अगर अगले बीस दिन में मोदी की बढ़त कुछ और घट गई तो मोदी रचित गुजराती अस्मिता और गुजराती समाज के बीच मुकाबले में सामाजिक संरचनाएं बाजी मार लेंगी। तब गुजरात में जाति भी चलेगी और समुदाय भी।