दृष्टिकोण.
पूर्व प्रधानमंत्री स्व. इंदिरा गांधी का यह कथन काफी मशहूर हुआ था कि ‘भ्रष्टाचार एक वैश्विक समस्या है।’ किसी फायदेमंद ठेके का सौदा इधर-उधर करने में सक्षम मंत्रियों, सरकारी कर्मचारियों या किसी भी अन्य व्यक्ति को प्रभावित करने के मकसद से रिश्वत दी जाती है। ऐसे ठेकों का आकार अरबों रुपयों में होता है।
जिस मुल्क में माल बनाया या जहां से बेचा जा रहा है उस देश के मंत्री या अधिकारी अथवा कंपनी से जुड़े व्यक्ति रिश्वत देने की पेशकश कर सकते हैं। कंपनी विदेशों से जो ठेके अर्जित करती है और उनसे देश की अर्थव्यवस्था में मदद मिलती है, तो क्या उनके देश को उन पर रिश्वत देने के आरोप में मुकदमा चलाना चाहिए? भ्रष्टाचार की समस्या की गंभीरता को देखते हुए 2005 में एक अंतरराष्ट्रीय संधि की जरूरत पड़ी।
हाल ही में अमेरिका में एक मामला सामने आया है। कुवैत में काम करने वाली एक अमेरिकी कंपनी ने 2004-05 के दौरान इराक में बीओटी आधार पर वेअरहाउस बनाने का एक बड़ा ठेका हासिल करने की गरज से अमेरिकी सैन्य अधिकारियों को लाखों डॉलर की रिश्वत दी। अमेरिकी सेना ने ली डायनामिक्स इंटरनेशनल नामक इस कंपनी को सरकार के साथ कारोबार करने के लिए जुलाई में प्रतिबंधित कर दिया।
ठेकों से संबंधित काम को कुवैत में देखने वाली अमेरिकी सेना की मेजर ग्लोरिया डेविस ने दिसंबर 2006 में बगदाद में खुद को गोली मारकर आत्महत्या कर ली। अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि ग्लोरिया ने सेना के जांच अधिकारी के सामने स्वीकार किया कि उन्होंने कंपनी से 2.25 लाख डॉलर की रिश्वत ली थी और उसके अगले दिन खुदकुशी कर ली।
कुवैत में स्थित सेना के कांट्रैक्टिंग ऑफिस ने पिछले चार वर्षो के दौरान 18 हजार ठेके प्रदान किए थे, जिनका मूल्य तीन अरब डॉलर के लगभग था। इसीलिए उक्त मामला भी उच्चस्तरीय टीम द्वारा की जा रही गहन जांच का हिस्सा बन चुका है। फिलहाल हैग में मुकदमे का सामना कर रहे लाइबेरिया के पूर्व राष्ट्रपति चाल्र्स टेलर पर आरोप है कि उन्होंने अमेरिकी, स्विस और अन्य अंतरराष्ट्रीय बैंकों में तीन अरब से अधिक की चुराई हुई दौलत छिपा रखी है। यह रकम लाइबेरिया के सालाना जीडीपी के लगभग बराबर है।
टेलर अकेले नहीं हैं। स्लोबोदान मिलोसेविक, अलबटरे फूजिमोरी और मोबुतु सेसे सेको का नाम इस दौर के सर्वाधिक भ्रष्ट नेताओं में शामिल है। ऐसे ही एक सानी अबाचा हैं जिन्होंने पद पर रहते हुए हर साल नाइजेरिया के जीडीपी का दो से तीन फीसदी धन डकार लिया। अनुमान है कि फर्डिनैंड माकरेस ने सरकारी खजाने से पांच से 10 अरब डॉलर तक की रकम अपनी जेब के हवाले की।
विकासशील देशों में भी भ्रष्टाचार काफी विकसित है, जहां निजी निवेश सीमित होता है और जनता सरकार पर ही अधिक आश्रित होती है। विकासशील देशों की मदद के लिए विश्व बैंक ने संयुक्त राष्ट्र के साथ मिलकर चोरी गई संपत्ति को हासिल करने की एक पहल की थी।
इसका मकसद था कि सत्ता के शीर्ष पर बैठकर सरकारी माल हड़पने के मनसूबे बनाने वालों को संदेश दिया जा सके कि जनता का धन चुराने वालों को कहीं पनाह नहीं मिलेगी। फिलीपींस की राष्ट्रपति ग्लोरिया अरोयो ने हाल ही में उम्र व बीमारी का लिहाज रखते हुए पूर्व राष्ट्रपति जोसेफ एस्ट्राडा को माफ कर दिया था। एस्ट्राडा ने भी राष्ट्रपति माकरेस की ही तरह देश को लूटा-खसोटा था और उन्हें 40 साल के लिए जेल भेज दिया गया था।
अरबों पाउंड और हजारों कामों के ठेके हासिल करने के लिए सऊदी अरब में कुछ लोगों को ब्रिटिश नागरिकों द्वारा रिश्वत दिए जाने के मामले में ब्रिटेन ने पुलिस जांच की कार्रवाई रोकने का फैसला किया है। इसके विपरीत 1978 में एक मामले में ब्रिटिश जज द्वारा की गई टिप्पणी गौर करने लायक है। 40 लाख पाउंड के एक सौदे के तहत ईरान को टैंक सप्लाई किए जाने थे।
1978 में सिग्नल्स ऑफिसर ले. कर्नल डैविड रैंडेल और रकाल लि. नामक ब्रिटिश कम्यूनिकेशन कापरेरेशन के दो वरिष्ठ अधिकारी ज्यॉफ्री वेलबर्न तथा फ्रैंक नरडीन को अदालत ने तलब किया। आरोप था कि मई 1971 और अक्टूबर 1972 के बीच रैंडेल को 14420 पाउंड की रकम रिश्वत में दी गई ताकि अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर वह ईरान द्वारा टैंक के लिए वीआरक्यू रेडियो उपकरण खरीदा जाना सुनिश्चित कर सकें। रैंडेल ने ओमान में सिग्नल रेजीमेंट की कमान संभालते हुए रिश्वत की मांग की थी।
रकाल लि. के मुखिया अर्नेस्ट हैरिसन ने रैंडेल को पैसा चुकाने की इजाजत दी थी ताकि वे ईरान के फौजी अधिकारियों को रिश्वत दे सकें। जनवरी 1978 में वेलबर्न और नरडीन को रिश्वत देने तथा रैंडेल को रिश्वत लेने का दोषी पाया गया। रैंडेल को तीन साल, नरडीन को 18 माह और वेलबर्न को सालभर की सजा सुनाई गई।
फैसला सुनाते हुए जज ने कहा ‘भ्रष्टाचार समाज के स्थायित्व पर हमला करता है। आपमें से हर एक ने जो किया है समग्र रूप से उससे समाज को आर्थिक लाभ तो होगा, मगर फायदे के लिए उसके तरीके को कभी भी सही नहीं ठहराया जा सकता।’ 13 महीने बाद दोषियों की अपील ठुकराते हुए अदालत ने कहा ‘रिश्वत देना और रिश्वत स्वीकार करना इस राज में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।’
जब पता चला कि अमेरिका के कापरेरेशनों ने विदेशों में सरकारी कामकाज के लिए रिश्वत दी है तो अमेरिकी कांग्रेस ने 1977 में फॉरेन करप्ट प्रैक्टिस एक्ट लागू किया। सिक्युरिटीज और एक्सचेंज कमीशन को जांच में पता चला कि 300 से अधिक अमेरिकी कंपनियों ने करोड़ों डॉलर की रिश्वत विदेशों में दी है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भ्रष्टाचार बढ़ता ही जा रहा है। अंतरराष्ट्रीय कारोबार में विदेशी सरकारी अधिकारियों द्वारा रिश्वत पर यूनेस्को ने 1977 में एक सम्मेलन बुलाया और इसके खिलाफ लड़ाई का प्रस्ताव दिया।।
हालांकि दोषियों को सजा देने का मामला देशों के कानून के मुताबिक उन पर ही छोड़ दिया गया था। इसमें काले धन को सफेद बनाने का मामला भी शामिल था। इसके तहत पारस्परिक कानूनी मदद और आरोपियों का प्रत्यर्पण भी अनिवार्य बनाया गया। मगर इसमें सिर्फ रिश्वत देने वाले को ही सजा देने का प्रावधान है, लेने वाले को नहीं।
प्रस्तावित समझौता भ्रष्टाचार मिटाने में मददगार होगा, इसमें संदेह है। सभी देश अपने हितों के अनुसार काम करते हैं। मगर सरकार देश के हित में अंतरराष्ट्रीय भ्रष्टाचार की अनदेखी करती है। घरेलू और अंतरराष्ट्रीय, भ्रष्टाचार का शिकार है भारत।
-लेखक वरिष्ठ कानूनविद हैं।