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दक्षिण में भाजपा के सपने

सम्पादकीय. कर्नाटक में बीएस येदुरप्पा के नेतृत्व में पांच सदस्यीय मंत्रिमंडल के गठन के साथ दक्षिण के किसी राज्य में भगवा झंडा फहराने का भाजपा का पुराना सपना पूरा हो गया है। इसी के साथ पार्टी पर राज्य के आम लोगों की सपनों को पूरा करने की महती जिम्मेदारी भी आ गई है।

इन्हीं सपनों को पूरा करके भाजपा दक्षिण में दूसरे राज्यों में पैर पसारने की कोशिश कर सकती है मगर ऐसा करने के पहले पार्टी को कर्नाटक में ही अपनी जड़ें मजबूत करनी होंगी और जद-एस सरीखे सहयोगी के नाज-नखरों से दो-चार होना होगा।

फिर दूसरे राज्यों की राजनीतिक हकीकत को समझना होगा। जनता दल के नेताओं के अहं के टकराव और उसमें टूट-दर-टूट ने कर्नाटक में भाजपा के लिए जिस तरह रास्ता खोला वैसी स्थितियां फिलहाल अन्य दक्षिणी राज्यों में नहीं हैं।

तमिलनाडु की राजनीति दोनों प्रमुख द्रविड़ पार्टियों-द्रमुक और अन्ना-द्रमुक की अगुवाई वाले गठबंधनों के इर्द-गिर्द घूमती है तो केरल में माकपा के नेतृत्व वाले वाम लोकतांत्रिक मोर्चे और कांग्रेस के नेतृत्व वाले प्रगतिशील लोकतांत्रिक मोर्चे के इर्द-गिर्द। तमाम कोशिशों के बाद भी भाजपा केरल में अपना खाता आज तक नहीं खोल पाई है और तमिलनाडु में भी गठबंधन के सहारे इक्का-दुक्का सफलता ही हासिल करती रही है।

इलाके के सबसे बड़े राज्य आंध्रप्रदेश में भाजपा के लिए कुछ संभावनाएं जरूर बनती हैं मगर वहां भी उसके लिए कांग्रेस और तेलुगूदेशम पार्टी सरीखी पार्टियों के बड़े जनाधार को देखते हुए कुछ शहरी क्षेत्रों में छिटपुट पैठ बनाने से ज्यादा गुंजाइश नहीं है।

कहा जा सकता है कि भाजपा को कर्नाटक में गठबंधन सरकार की अगुवाई करने का मौका मिलने का अन्य दक्षिणी राज्यों में उसकी संभावनाओं से कोई सीधा नाता नहीं है। हां, पार्टी अब गर्व के साथ यह जरूर कह सकती है कि वह केवल काऊ-बेल्ट की पार्टी नहीं है।

येदुरप्पा के शपथ-ग्रहण समारोह में पहुंचे गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने यह कहकर कि कर्नाटक गुजरात मॉडल अपनाएगा, एक सुरसुरी जरूर छोड़ी पर भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने गुजरात मॉडल की व्याख्या वहां के विकास के मॉडल से करके स्थिति संभालने में देर नहीं की।

मोदी के लिए गुजरात मॉडल का आशय कुछ भी क्यों न हो मगर सारे देश के लिए इस मॉडल का आशय उग्र हिंदुत्व से ही है और मुस्लिम वोटों पर नजर गड़ाए देवेगौड़ा की जद-एस के फिर से बिफरने के लिए मोदी की यह टिप्पणी काफी थी।

बहरहाल, सरकार चलाने के लिए मिले 19 महीनों में जमीन से जुड़े येदुरप्पा यदि पूर्व प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी की नसीहत पर अमल करते हुए धरम सिंह और कुमारस्वामी की पिछली सरकारों से अलग छाप छोड़ सके और विपरीत परिस्थितियों को अवसरों में बदल सके तो कर्नाटक में भाजपा अकेले दम पर सत्ता में आने के हकीकत में बदल सकने वाले सपने भी देख सकती है।





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