नई दिल्ली. डॉक्टरों की गलती से उस पर एड्स पीड़ित होने का ठप्पा क्या लगा कि सरकारी डॉक्टरों ने भी इलाज करने से कन्नी काट ली। समाज ने उसे बहिष्कृत कर दिया। मानसिक यंत्रणा झेलने के बाद जिला उपभोक्ता फोरम में कानूनी लड़ाई जीती तो संबंधित डॉक्टरों को पहले राज्य और फिर राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग से राहत मिल गई। अब उसने मुआवजे के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है।
जस्टिस बीएन अग्रवाल की अध्यक्षता वाली बेंच ने याचिका को विचारार्थ स्वीकार करते हुए उस डॉक्टर दंपती को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है, जिसने पीड़ित की बीमारी की गलत पहचान की थी। याचिकाकर्ता सुशील कुमार राजस्थान के नागौर जिले में डीडवाना कस्बे के बारदवा गांव का रहने वाला है। जिला उपभोक्ता फोरम ने उसे दो लाख रुपए मुआवजा देने का फैसला दिया था, लेकिन राज्य उपभोक्ता आयोग और राष्ट्रीय आयोग ने इसे खारिज कर दिया।
क्या है मामला : 12 सितंबर, 2002 को सुशील कुमार को सीकर के रुचिका डायग्नोसिस एंड रिसर्च सेंटर में एपेंडिसाइटिस के ऑपरेशन के लिए भर्ती किया गया था। ऑपरेशन के बाद उसे छुट्टी दे दी गई, लेकिन पेट में दर्द जारी रहने के कारण वह वापस आया तो कुछ टेस्ट के बाद सेंटर चलाने वाले डॉक्टर दंपती वीरेंद्र महला और शारदा महला ने उसे एचआईवी पॉजिटिव बता दिया। दंपती ने एड्स का कोई इलाज नहीं होने के कारण सुशील के परिवार वालों को उसे घर ले जाने की सलाह दी।
अस्पताल में झेली मानसिक यंत्रणा : सुशील के परिवार वाले जब उसे राज्य के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल एसएमएस, जयपुर ले गए तो कोई डॉक्टर उसका इलाज करने को तैयार नहीं था। अस्पताल स्टाफ ने उसके पलंग के पास ‘एड्स रोगी, कोई भी करीब न जाए।’ का बोर्ड टांग दिया। इससे परेशान होकर सुशील का परिवार उसे बीकानेर के ईबीएम सरकारी अस्पताल ले गया। यहां भी डॉक्टरों ने रुचिका डायग्नोसिस सेंटर की रिपोर्ट के आधार पर यह कहते हुए इलाज से मना कर दिया कि अस्पताल में एचआईवी रोगियों के इलाज की व्यवस्था नहीं है।
सामाजिक बहिष्कार का दंश भी झेला : हार-थक कर परिजन सुशील को गांव ले गए तो गांववालों ने उसका और उसके परिजनों का सामाजिक बहिष्कार कर दिया। उसकी पत्नी को एचआईवी टेस्ट कराने को बाध्य किया, लेकिन उसकी पत्नी की रिपोर्ट नेगेटिव आई। इस बीच परिजनों ने सुशील को फिर डॉक्टरों को दिखाने का फैसला किया। जयपुर के एक प्राइवेट अस्पताल में जांच कराई तो सुशील एचआईवी नेगेटिव पाया गया। इसके बावजूद संतुष्टि के लिए यहीं के एक अन्य अस्पताल में फिर जांच कराई तो भी रिपोर्ट नेगेटिव निकली।
डाग्नोस्टिक सेंटर की दलील : डॉक्टर दंपती ने दलील दी कि उनकी रिपोर्ट प्रारंभिक जांच पर आधारित थी। रोगी को सलाह दी गई थी कि पुष्टि के लिए वह वेस्टर्न ब्लॉक स्कीम टेस्ट जरूर करा ले, जो उसने नहीं कराया।