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Chhattisgarh
Raipur Raipur रायपुर. दिवाली के पटाखों ने तीन दिनों तक शहर के ह़दयस्थल जयस्तंभ समेत कई स्थानों को प्रदूषण के मामले में हलाकान रखा। पटाखों से होने वाले प्रदूषण ने मानक स्तर के सारे रिकार्ड ध्वस्त कर दिए। औद्योगिक क्षेत्रों की धूल, वाहनों से निकलने वाला काला धुआं और ऊपर से दिवाली के ताबड़तोड़ धमाकों से तीन दिनों तक शहर की फिजा में जहर घुला रहा। 
इस दौरान धुएं से होने वाला प्रदूषण डेढ़ गुणा बढ़ गया। ध्वनि प्रदूषण का आकड़ा निर्धारित से दोगुने स्तर तक पहुंच गया। वैज्ञानिकों का कहना है कि इसका असर तत्काल नहीं दिख रहा लेकिन दूरगामी परिणाम चिंतनीय होंगे। इस दिशा में शहर को सकारात्मक पहल करने की जरुरत है।
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने दिवाली में प्रदूषण मापने के लिए विशेष इंतजाम किए थे। वैज्ञानिकों ने जयस्तंभ चौक, सिटी कोतवाली और टाटीबंध में वायु और ध्वनि प्रदूषण की मानिटरिंग की। तीन दिन आंकड़े लिए गए। इनमें जो तथ्य आएं वे चौंकाने वाले हैं। धनतेरस से लेकर दिवाली के दिन तक जयस्तंभ चौक और सिटी कोतवाली का इलाका सर्वाधिक प्रदूषित रहा।
यहां जो आंकड़े आए वे टाटीबंध के आंकड़े से अधिक निकले। जबकि दोनों क्षेत्र में काफी अंतर है। सिटी कोतवाली और जयस्तंभ चौक व्यावसायिक क्षेत्र हैं जबकि टाटीबंध औद्योगिक। 3 नवंबर को लिए आब्जर्वेशन में प्रदूषण मानक स्तर ज्यादा था। इसके बाद 7 और 9 नवंबर को लिए आब्जर्वेशन में इसमें भारी वृद्धि हुई।
रिस्पेरेबल सस्पेंटेड पर्टिकुलेट मैटर (आरएसपीएम) का मानक स्तर 100 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर है। पहले दिन इसे सिटी कोतवाली में 132 और जयस्तंभ चौक में 128 मापा गया। दिवाली के दिन यह क्रमश: 168 और 141 तक पहुंच गया। टाटीबंध में यह 138 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर रहा। सस्पेंटेड पर्टिकुलेट मैटर (एसपीएम) का मानक स्तर 200 माइक्रो ग्राम प्रति घनमीटर है।
सिटी कोतवाली में यह सामान्य से 91 और जय स्तंभ चौक पर 55 अधिक मापा गया। आरएसपीएम और एसपीएम इतने ब्लैक कार्बन के इतने छोटे कण होते हैं जो सांस के साथ सीधे फेफड़े में पहुंचते हैं और जमा हो जाते हैं। इससे सांस की गंभीर बीमारियां होती हैं।
पटाखों से निकलने वाले सल्फर डाईआक्साइड (एसओटू) और नाइट्रोजन डाइआक्साइड (एनओटू) की मात्रा मानक से कम रही लेकिन यह आम दिनों की तुलना में बहुत अधिक दर्ज किया गया। प्रदूषण बोर्ड के क्षेत्रीय अधिकारी आरपी तिवारी के मुताबिक प्रदूषण का कारण यातायात का अत्यधिक दबाव भी है।
शोर ने उड़ाई धज्जियां
सुप्रीम कोर्ट ने 125 डेसीबल से अधिक आवाज वाले पटाखे प्रतिबंधित किए थे। लेकिन शहर में इसकी खुलेआम धज्जियां उड़ाई गई। इसी वजह से ध्वनि प्रदूषण का आंकड़ा दोगुने स्तर को पार कर गया। शोर का मानक स्तर 55 डेसीबल है। प्रदूषण बोर्ड ने दो जगह इसकी मानिटरिंग की। पहले दो दिन यह मानक से 33 से 40 डेसीबल अधिक रहा।
दिवाली के दिन यह सिटी कोतवाली में 119 और जयस्तंभ चौक पर 114.2 डेसीबल मापा गया। पिछले साल राष्ट्रीय स्तर पर ध्वनि प्रदूषण 90 डेसीबल मापा गया था। इस साल रिकार्ड ध्वस्त हो गया। मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि अत्यधिक शोर से व्यक्ति का नर्वस सिस्टम सबसे पहले डेमेज होता है। इससे तनाव और व्यवहार में चिड़चिड़ापन आ जाता है।
उद्योगों से हजारों टन धूल
सिलतरा क्षेत्र में पांच बड़े और 77 मध्यम श्रेणी के उद्योग हैं। इनमें 40 स्पंज आयरन प्लांट हैं, जिनसे सर्वाधिक प्रदूषण होता है। उरला इलाके में 43 मध्यम और 381 छोटे उद्योग हैं। 100 टन स्पंज आयरन बनाने में 330 टन कच्च माल लगता है। यानी इतनी क्षमता वाले एक स्पंज आयरन प्लांट से रोजाना 230 टन धूल, वेस्ट और धुंआ निकलता है। इस तरह रोजाना 33 हजार टन धूल, धुंआ और सालिड वेस्ट बाहर आ रहा है।
गोदाम से भी निकला धुआं
सोमवार को रामसागरपारा के गोदामों में लगी आग से हर तरफ काला धुआं छा गया। तकरीबन छह घंटे तक काला धुआं निकलते रहा। कुछ देर के लिए इसने सूर्य को भी ढंक दिया। मंगलवार की सुबह 5 बजे भी आसमान पर धुएं की काली परत दिखाई दे रही थी। दिवाली के बाद इस तरह के दृश्य कई बार दिखाई दिए।
जानकारों के अनुसार पिछले कुछ दिनों से शहर में धुंध भी छाई, जिसे लोगों ने सुबह के वक्त जरूर देखा। पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय के शोध-छात्र नितीन जायसवाल ने बताया कि ठंड के सीजन में हवा का घनत्व बढ़ जाता है। इस वजह से ज्यादा ऊंचाई में जाने की बजाए फैल जाता है।