जोधपुर. श्वास की तकलीफ आज दुनिया में मृत्यु का चौथा प्रमुख कारण है और 2020 तक यह तीसरा प्रमुख कारण बन जाएगा। भारत में करीब डेढ़ करोड़ लोग
इस बीमारी से ग्रस्त है।
क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज सीओपीडी का उपचार आज अत्याधुनिक दवाओं और श्वसन व्यायाम के जरिए संभव है, जबकि कुछ वर्ष पहले तक यह बीमारी उपेक्षित थी और उपचार की कारगर दवाएं भी उपलब्ध नहीं थीं। सीओपीडी का प्रमुख लक्षण है लगातार खांसी, बलगम एवं थोड़ा परिश्रम करने पर भी सांस लेने में तकलीफ होना। यह रोग बहुधा 35 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों में होता है।
धूम्रपान करने वाले 80 फीसदी लोगों को दमा
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार भारत में करीब 25 करोड़ लोग धूम्रपान करते हैं और धूम्रपान ही 80 फीसदी दमा मरीजों के लिए प्रमुख कारण बना हुआ है। धूम्रपान के अलावा प्रदूषित वातावरण, फैक्ट्रियों से निकलने वाला धुंआ, वायु प्रदूषण और केमिकल्स इस रोग के कारण बन सकते हैं। दमा रोग से संबंधित भ्रांतियों के प्रति जागरुकता लाने के लिए प्रतिवर्ष अभियान चलाया जाता है, ताकि रोगी सामान्य जीवन व्यतीत कर सके।
चिकित्सकों का यह भी कहना है कि अस्थमा का समय पर उपचार नहीं कराने पर रोग बढ़ सकता है। चिकित्सा विज्ञान के अनुसार अस्थमा में केमिकल व सेल्यूलर मीडिएटर काम करते हैं, जो श्वास नलियों में सूजन के साथ संवेदनशीलता बढ़ाते हैं।
* शिकागो में हाल ही में हुई कांफ्रेंस में इस बीमारी को केवल फेफड़े की बीमारी नहीं मान कर सिस्टेमिक माना गया है। इसका असर मांस पेशियों, दिमाग और हृदय पर भी होता है। यह बीमारी फेफड़े के कैंसर में भी तब्दील हो सकती है। इसके लिए दो नए उपचार विकसित किए गए हैं।
—डा. अशोक राठी राठी अस्पताल, जोधपुर
* सीओपीडी फेफड़े की बीमारी है। इसमें ऐसी दवाई का उपयोग करना चाहिए जो सीधे फेफड़ों पर असर करे और यह काम इन्हेलर करते हैं। आधुनिक विकसित दवाइयों के कारण इस रोग का उपचार अपेक्षाकृत आसान हो गया है।
—डा. पीडी मोतियानी केएन चेस्ट हॉस्पिटल, जोधपुर