जोधपुर. थार डेजर्ट की सूरत और सीरत बदल रही है। सुरक्षा और संरक्षण के अभाव में यहां की बहुजैवविविधता इस हद तक खतरे में पड़ गई है कि वन्यजीवों
समेत वनस्पतियों की कई प्रजातियां लुप्त होने लग गई हैं। चौंकाने वाला पहलू यह है कि संरक्षण के जिस मकसद से बाड़मेर व जैसलमेर में डेजर्ट नेशनल पार्क घोषित किया गया था, वह महज खानापूर्ति साबित हुआ है। नतीजा यह है कि ग्रेट इंडियन बस्टर्ड (गोडावण) तक के आश्रय स्थल उजड़ रहे हैं। अन्य प्रजातियां तो गंभीर संकट के दौर से गुजर रही हैं।
वन्यजीव विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि 19 साल पहले थार डेजर्ट को बायोस्फीर रिजर्व घोषित कर दिया जाता तो इस प्राकृतिक संपदा को काफी हद तक बचाया जा सकता था। लेकिन इतने सालों बाद भी न तो केंद्र और न ही राज्य सरकार इस ओर ध्यान दे रही है।
थार को बायोस्फीयर रिजर्व घोषित करने की शुरुआती कवायद से जुड़ रहे पर्यावरणविद् डा. एसएम मोहनोत कहते हैं, ‘दो दशक पहले जब हमने इस इश्यू पर जेएनवीयू में विचार-मंथन शुरू किया था, तब महानिरीक्षक (वन) एजी ऑक तक ने जोधपुर आकर इस प्रस्ताव पर गहरी दिलचस्पी दिखाई थी। लेकिन उसके बाद से राजनीतिक दांवपेच में फंसे इस प्रस्ताव पर किसी ने गंभीरता नहीं दिखाई। थार को बचाने का यह नायाब विकल्प है। इसे लेकर किसी को शंका नहीं रहनी चाहिए, क्योंकि इसमें कानूनी जटिलताएं नहीं होकर जैव विविधता के साथ मानवीय आवश्यकताओं की पूर्ति के नई संभावनाएं जुड़ी हैं। यदि हम भी विलंब करते रहे तो बहुत कुछ ऐसा खो देंगे, जिसकी भरपाई कभी संभव नहीं है।’
कमोबेश यही सोच केंद्रीय रुक्ष क्षेत्र अनुसंधान संस्थान (काजरी) के पूर्व निदेशक डा. आरपी धीर की हैं। उनका कहना है कि बायोस्फीयर रिजर्व एक ऐसा विकल्प हैं, जो यहां के जनजीवन को रोजगार के नए अवसर दे सकता है। जीव-जंतुओं के संरक्षण के लिए अनुकूल माहौल दे सकता है, लेकिन लगता नहीं है कि राज्य सरकार ऐसे किसी प्रस्ताव पर ठोस कदम उठाएगी। दिखावा करने और कहने के लिए तो अच्छा है कि इस योजना से तस्वीर बदल जाएगी, लेकिन अंदरुनी बात यह है कि राज्य सरकार ऐसे किसी प्रस्ताव से माइनिंग से होने वाली अपनी आय नहीं खोना चाहेगी।
धीर का कहना है कि बतौर वैज्ञानिक हम जैव विविधता की कितनी ही पैरोकारी क्यों न करें, सुनवाई कहीं नहीं होती।
सभी पहलू देखकर हल निकालें
डा. एनएस राठौड़, पूर्व उप निदेशक, भारतीय प्राणी सर्वेक्षण
थार डेजर्ट की बहुजैवविविधता सबसे अनोखी है। 1988 में वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने इसे बायोस्फीयर रिजर्व बनाने के लिए वैज्ञानिक समूह से प्रोजेक्ट डॉक्यूमेंट तैयार करवाया था, जिसने कई सिफारिशें की थी, लेकिन उसके लागू नहीं होने के कारण स्थितियां बिगड़ रही हैं। सबसे बड़ी समस्या इंदिरा गांधी नहर परियोजना की एक शाखा का इस क्षेत्र के बीच से होकर गुजरना है। इसके अलावा सोनू लाइम की खदानों से चूना पत्थर भी निकाला जा रहा है।
नहर आने से बेशक यहां पानी की उपलब्धता रहेगी, लेकिन शुष्क वातावरण में रहने वाले जीव-जंतुओं व वनस्पति के संकटग्रस्त होने की समस्या सामने आ सकती हैं। ओफियोमोरस (सेंडफिश) व जैसलमेर टोडआगमा जैसी छिपकलियां केवल शुष्क मुलायम रेत में रहने की ही आदी हैं, नमी बढ़ने से उनके आश्रय स्थल पर संकट आने का खतरा है। सांडा भी इस संकट की चपेट में आ सकता है।
जिस गोडावण के लिए थार पहचाना जाता है, उसके आश्रय स्थलों पर उगी सेवण घास भी ज्यादा नमी सहन नहीं कर सकती। हो सकता है इससे नमी पसंद प्रजातियों की यहां दस्तक बढ़ जाए, लेकिन यह तय है कि थार डेजर्ट की जैव विविधता खतरे में पड़ जाएगी।
ऐसे में हमें जीव-जंतु व वनस्पति के संरक्षण के साथ विकास व बढ़ती आबादी को मद्देनजर रखते हुए समाधान ढूंढना होगा। चूंकि डेजर्ट नेशनल पार्क का क्षेत्रफल बहुत ज्यादा है, लिहाजा इसे बायोस्फीयर रिजर्व बनाकर संरक्षित व सुरक्षित रखा जा सकता है। इससे लोगों के हित भी प्रभावित नहीं होंगे और अतिरिक्त वित्तीय स्रोत खुलने से प्राकृतिक संपदा को बचाया जा सकेगा।
क्या हैं खतरे
* थार डेजर्ट की इकोलॉजी में नहर आने के बाद जबर्दस्त बदलाव। नमी पसंद जीव-जंतुओं और वनस्पति की दस्तक, जबकि शुष्क आबोहवा वाली जैविक संपदा लुप्त होने के कगार पर।
* शुष्क पारिस्थितिकी वाले पेड़-पौधों की कमी होने से मृदा क्षरण बढ़ा।
* पशुपालन संकट में। थारपारकर समेत दुधारू नस्ल का गोवंश विलुप्त। रेगिस्तान का जहाज ऊंट तक संकट के दायरे में।
* प्रतिकूल जोन में कृषि का दबाव बढ़ा। नैसर्गिक माहौल में मानवीय हस्तक्षेप।
* माइनिंग व अन्य पारस्थितिकी गतिविधियां बढ़ने से परंपरागत आश्रय स्थल उजड़े।
बचानी होगी जैविक विरासत
* थार डेजर्ट डंडा थोर, कुम्भट, केर, जाल, खेजड़ी, रोहिड़ा, आक, बबूल, बेर, बुई, सेवण-भूरट घास, खीप जैसी स्थानीय वनस्पतियों का खजाना रहा है, लेकिन अब खजाने में सेंध लग रही है।
* नील गाय, चिंकारा, डेजर्ट कैट, लोमड़ी, जंगली खरगोश, सेई, सेवला, नेवला, जेकाल, विभिन्न जातियों के चूहे, गिलहरी, छछुंदर सहित स्तनधारियों की मौजूदगी यहां दर्ज की गई है।
* पक्षियों में राज्य पक्षी गोडावण, बगुले, तीतर, मोर, क्रेन, टीटेरी, सेंड ग्राउज, फाख्ता, नील कंठ, सुगन चिड़िया, सतभईयां, मैना, बुलबुल, ड्रेग्रो, जंगली कौआ, बुशचेट, सनबर्ड, मुनिया, गिद्ध, चील, बाज, शिकरा, उल्लू, तिलोट व शाही सेंड ग्राउज प्रमुख है।
* रेंगने वाले जीवों में कील रोक गीको, सेंड गीको, गिलोडी, डेजर्ट आगामा, जैसलमेर टोड आगामा, गोह, सांडा, गिरगिट, नाग, परड, ऐरीक्स, सेंड स्नेक, रेट स्नेक व विषहीन जातियां मिलती हैं।
* मेढ़क की एक जाति बारिश में नजर आती है। टोड की एक जाति नाडी की दरारों में छुप कर रहती है। सूत्रकर्मी की आठ जातियां, मोलस्का की दो जातियां, बिच्छु की आठ जातियां, कन्छले की पांच जातियां, टिड्डे, टिड्डियां, झिंगुर आदि की 11 जातियां, तितली की तीन, चिंटियों की 16 तथा दीमक की 15 जातियां मिलती हैं।