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Shekhawati Shekhawati सीकर. बालश्रम रोकने में नाकाम रहने वाले अधिकारियों को अब जेल की हवा खानी पड़ सकती है। इसके लिए कानून का मसौदा तैयार कर लिया गया है। इसे
जल्द ही लागू किया जाएगा।
श्रमविभाग के अनुसार बालश्रम के मौजूदा कानून अपर्याप्त है, इसलिए सोशल ज्यूरिस्ट व वीवी गिरी राष्ट्रीय श्रम संस्थान ने नया प्रस्ताव तैयार करके दिया है। नए प्रस्ताव में बालश्रम के लिए सीधे जिला कलेक्टरों को जिम्मेदार बनाने व इसे रोकने में नाकाम अधिकारियों को दंडित करने का फैसला लिया गया है।
प्रस्तावित अधिनियम को ‘बाल श्रम निषेध मुक्ति’ और ‘बचपन की बदहाली अधिनियम 2007’ नाम दिया गया है। इस अधिनियम में बाल मजदूरी बंद होने से अभिभावकों को होने वाले आर्थिक नुकसान की भरपाई तथा 14 साल से कम उम्र के बच्चों को हर किस्म के श्रम से मुक्त रखने का निर्णय लिया गया है। अधिनियम की पालना की जिम्मेदारी केंद्रीय श्रम मंत्रालय की बजाए सीधे राज्य प्रशासन को सौंपी जाएगी। राष्ट्रीय श्रम संस्थान ने भी बालश्रम पर लगाम कसने के लिए अधिनियम को बेहतर बताया है। बच्चों के अधिकारों से जुड़ी संस्थाओं व श्रम कानून विशेषज्ञों ने मौजूदा कानून पर चिंता जताते हुए बाल श्रमिकों की बढ़ती संख्या पर नाराजगी जताई थी।
डाक्टर भी निशाने पर
नया अधिनियम लागू होने के बाद बालश्रम रोकने में असफल रहने वाले अधिकारियों को तथा बालश्रम के दोषियों को एक से तीन साल की सजा होगी। दोबारा लिप्त पाए जाने पर न्यूनतम पांच साल की सजा का प्रावधान है। साथ ही बाल मजूदरों की उम्र के संबंध में झूठा प्रमाण-पत्र देने वाले डाक्टरों को भी दंडित किया जाएगा।
अब होगी सख्ती
केंद्र ने राज्य सरकारों को बालश्रम पर रोक लगाने के लिए सख्ती से अभियान चलाने के निर्देश दिए हैं। अभियान में श्रम संगठनों व पुलिस प्रशासन की भी मदद ली जाएगी। श्रम विभाग के अनुसार दिसंबर तक यह अभियान शुरू किया जाएगा। बाल श्रमिकों का जीवन सुधारने के लिए संबंधित संगठनों को करीब 22 लाख रुपए भी मिलेंगे।
* इस मसौदे के लागू होने के बाद बाल श्रमिकों की बढ़ती संख्या पर भी लगाम लग सकेगी। अभियान भी इनके जीवन में चार-चांद लगाएगा। नये साल तक अधिनियम की सख्ती से पालना शुरू कर दी जाएगी।’
-पाटंजलि भू, डिप्टी कमिश्नर, श्रम विभाग, जयपुर