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Chhattisgarh
Bilaspur Bilaspur बिलासपुर. पैंसेजर और मालगाड़ी की दुर्घटनाओं बाद रेलवे की जांच में सामने आने वाले परिणामों को दरकिनार कर अफसरों द्वारा अपनी मर्जी से कार्रवाई करने की बात सामने आई है। चार घटनाओं की जांच रिपोर्ट के बाद हुई कार्रवाई तो कुछ ऐसी ही कहानी कह रही है।
रेलवे में ट्रेनों के दुर्घटनाग्रस्त होने के बाद महकमे के आला अधिकारियों से मामले की जांच कराई जाती है और इस जांच में आने वाले तथ्यों के हिसाब से ही कार्रवाई का प्रावधान है। बिलासपुर मंडल में ट्रेन दुर्घटनाओं के बाद हुई जांच की रिपोर्ट कुछ और कह रही है और कार्रवाई किसी और दिशा में हुई। 5 दिसंबर 2006 को जैतहरी स्टेशन में इंदौर-बिलासपुर पैसेंजर दुर्घटनाग्रस्त हुई।
पैंसेजर सिग्नलमेन की गलती से मेन लाइन की जगह लूप लाइन में चली गई। उस समय ट्रेन की स्पीड 60 किलोमीटर प्रति घंटा थी, वहीं लूप लाइन में यह गति 15 किलोमीटर प्रतिघंटा होनी थी। स्थिति समझ में आने के बाद ड्राइवर ने तत्काल इमरजेंसी ब्रेक लगा जैसे-तैसे ट्रेन को रोका। भारी झटके खाने के बाद ट्रेन रुक पाई। मामले की गंभीरता का देखते हुए जांच के आदेश दिए गए।
जांच रिपोर्ट में सिग्नल विभाग के अधिकारी को मुख्य आरोपी पाया गया और इसे चार्ज शीट भी जारी की गई। बाद में अचानक यह कार्रवाई वापस ले ली गई और उस अधिकारी को दोष मुक्त कर दिया गया। 15 मार्च 2007 को सिग्नल के कनफ्यूजन के चलते मेल दुर्घटनाग्रस्त होते-होते बची और मालगाड़ी दुर्घटनाग्रस्त हो ही गई।
यह घटना बिलासपुर आरआरबी केबिन के पास हुई। 10 अप्रैल 2007 को अकलतरा से लाफार्ज की तरफ जा रही एक मालगाड़ी दो हिस्से में विभक्त होकर अलग-अलग ट्रेक में पहुंच गई। इन दोनों मामलों में सिग्नल विभाग के एक ही अधिकारी को दोषी पाया गया। जांच रिपोर्ट भी उसके खिलाफ आई। इन सब के बाद भी उसकी निंदा करके मामले कर निपटा दिया गया।
जूनाडीह में 13 अक्टूबर को 9 व 15 अक्टूबर को मालगाड़ी के 7 डिब्बे दुर्घटनाग्रस्त हुए। इस घटना से रेलवे का करोड़ों की क्षति हुई, लेकिन इस घटना की जिम्मेदारी ही तय नहीं की गई। इस तरह पिछले एक साल में अलग-अलग ट्रेन दुर्घटनाओं के बाद जांच भी हुई और रिपोर्ट भी आई, लेकिन कार्रवाई के समय मामला टांय-टांस फिस्स होता गया। यह स्थिति लगातार सामने आ रही है।
ड्राइवरों के मामले में कहानी कुछ और
पिछले साल दीपका साइडिंग में संटिंग के दौरान एक इंजन पटरी से उतर गया था। दस मामले में ट्रेन के चालक को बर्खास्त कर दिया गया था। इसी तरह कई घटनाओं में ड्राइवर और असिस्टेंड ड्राइवरों के खिलाफ कार्रवाई होती रही। वहीं दूसरे विभाग के मामले सामने आने पर कार्रवाई के नाम पर खाना पूर्ति ही की जाती है। यह स्थिति रेलवे की जांच पर सवाल खड़े कर रही है।