News
Chhattisgarh
Bilaspur Bilaspur बिलासपुर. स्कूलों में बच्चों के साथ मारपीट की कहानी वैसे तो बहुत पुरानी है, लेकिन बच्चों को मारने वाले शिक्षक हो या उनके माता-पिता दोनों ही नहीं जानते कि इसके क्या दुष्परिणाम होंगे। शिक्षाविद कहते है कि फुल से बच्चों को माली जैसा प्यार चाहिए।
बाल दिवस के मद्देनजर दैनिक भास्कर ने कुृछ शिक्षाविदों से चर्चा की। पीजीबीटी कालेज के व्याख्याता अरुण कुमार पोद्दार कहते हैं कि बच्चों को मारने से उनका मानसिक व शारीरिक विकास तो रूकता ही है, वे अंतमरुखी भी हो जाते हैं।
आगे चलकर वे सामाजिक दायित्वों का निर्वहन नहीं कर पाते। न तो कोई मुकाम हासिल कर पाते हैं और न ही अपने माता-पिता का नाम रोशन। बच्चों को मारने से उनमे अपराधिक प्रवृत्ति बढ़ने का खतरा रहता है। वे विद्रोही भी जाते हैं। श्री पोद्दार कहते हैं कि मारपीट की बजाय शिक्षक व माता-पिता को प्यार व संयम के साथ बच्चों को सुधारने व समझाने का प्रयास करना चाहिए।
शिक्षक डा. प्रफुल्ल कुमार शर्मा कहते हैं कि बच्चों को उन्हीं की भाषा में समझाना चाहिए और सही रास्ते में लाना चाहिए। उनके सामने विभिन्न उदाहरण रखकर समझाने का प्रयास करना चाहिए। शासन ने वैसे भी स्कूलों में बच्चों के साथ मारपीट को पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिया है। वह गणित के शिक्षक हैं उन्हें भी कई बार होमवर्क नहीं करके आने वाले बच्चों के प्रति झुंझलाहट होती है, लेकिन यदि उन्हें मारा जाएगा तो वे जो जानते हैं उसे भी भूल जाएंगे।
कमजोर बच्चों के लिए शिक्षकों को अलग से समय निकालना चाहिए। माशिमं सदस्य व शिक्षाविद उद्घव मोटवानी कहते हैं कि बच्चे पिटाई करने से नहीं सुधरते, बल्कि और बिगड़ जाते हैं। उन्हें तो बड़ी ही प्यार से समझाना चाहिए। चाहे वे माता-पिता हो या फिर शिक्षक। श्री मोटवानी कहते हैं कि ऐसा कोई व्यक्ति नहीं जो ये कहे कि उसका बच्चा मारने से सुधर गया, बच्चे समझाने से ही सुधरते हैं।
ज्यादातर मारपीट करने वाले माता-पिता ही होते हैं, जबकि कुछ स्कूलों में भी मारपीट होती है। पुरानी कहावत झड़ी पड़े झम-झम विद्या आए छम-छम का आज कोई मूल्य नहीं। बच्चों को खुली हवा और खुली रोशनी चाहिए ताकि ज्ञान का प्रकाश उनके मस्तिष्क में जाए।
छत्तीसगढ़ स्कूल में केमेस्ट्री के व्याख्याता डीएल पाटनवार कहते हैं कि स्कूलों में बच्चों को दंडित करना ठीक नहीं है। गुरु-शिष्य परंपरा तो अब रही नहीं, इसलिए पुराने जमाने की तरह दंडित क्यों किया जाए। बच्चों का प्यार से समझाना चाहिए, क्योंकि आज के बच्चे पुराने बच्चों की तरह नहीं है। बच्चों की आईक्यू तेज हैं, मारने-पीटने से उनमें सीखने की इच्छा धीरे-धीरे खत्म हो जाएगी।
सरकंडा स्कूल के प्रभारी प्राचार्य अनिल तिवारी का कहना है कि बच्चों के साथ मारपीट करने वाले शिक्षक व अभिभावकों को बाल दिवस पर बच्चों को किसी तरह का दंड नहीं देने का संकल्प नहीं लेना चाहिए, ताकि बच्चे पंडित जवाहर लाल नेहरू के सपनों को साकार करते हुए देश का भविष्य बन सके। कुछ इसी तरह के विचार मल्टीपरपज स्कूल के प्राचार्य पूर्व एस. विश्वकर्मा के भी हैं।
वे कहते हैं कि मारपीट से कुछ हासिल नहीं होगा, बल्कि बच्चों में अनुशासनहीनता, उद्दंडता, नकारात्मकता, पढ़ाई के प्रति उदासीनता बढ़ती है। धीरे-धीरे वे समाज के उस अंग की तरह बन जाते हैं जो नुकसान पहुंचाते हैं।
सरस्वती शिशु मंदिर तिलकनगर के पूर्व प्राचार्य विमल नोमुलवार कहते हैं कि बच्चों का मन फूल की तरह कोमल होता हैं। किसी भी देश का भविष्य बच्चों पर निहित होता है। इसलिए बच्चों को विकसित करने का प्रयास करना चाहिए, उन्हें सुधारने के लिए विद्यालय को यातनालय नहीं बनाना चाहिए।