करनाल भारत में भले ही मुर्राह भैंस को अब वैज्ञानिक सुपर मुर्राह बनाने की कोशिश कर रहे हों, अब लेकिन विश्व स्तर पर भैंस की यह नस्ल पिछड़ सकती है। यदि समय रहते इस पर और शोध नहीं किए गए तो भैंस की प्रजाति को भी खतरा पैदा हो सकता है। जिसका सबसे बड़ा कारण ब्राजील द्वारा मुर्राह भैंस का सीमन विश्व के अधिकांश देशों के अलावा इंडिया में भी सप्लाई किया जाना है।
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के पूर्व पशु विज्ञान उप महानिदेशक डा. आरएम आचार्या ने एनबीएजीआर में बताया कि इसमें कोई दो राय नहीं है कि इंडिया की मुर्राह विश्व में अपना जादू बिखेर रही है, लेकिन किसी भी बड़ी क्वालिटी को बरकरार रखने को प्रयास जारी रखने चाहिए। पंजाब व हरियाणा सरकार ने वैज्ञानिक स्तर पर प्रयास तो जरूर शुरू किए हैं, लेकिन ब्राजील के प्रयासों से हम पीछे हैं। वहां इतने बढ़िया कटड़े तैयार किए जाते हैं, जिनका सीमन विश्व में नंबर वन हो चला है। ब्राजील ने हमसे मुर्राह ली और हमें ही अब वे बढ़िया सीमन बेचने जा रहे हैं। इंडिया को भी ऐसे प्रयास करने होंगे कि विश्व बाजार में मुर्राह किस्म के इंडियन कटड़ों का सीमन जाए, वरना यहीं की भैंस, यहीं पर पिछड़ सकती है।
क्या करना होगा :
पूर्व उप महानिदेशक ने कहा कि पशु पालकों को नस्ल बचाए रखने को प्रोत्साहित करने के अलावा नए शोध करने होंगे, सुपर मुर्राह से कहीं अच्छी क्वालिटी के कटड़े व कटड़ी तैयार करनी होगी। इसमें सरकार को बजट भी ब्राजील से अधिक तय करना होगा, ताकि कोई कमी आड़े न आए।
क्या है इंडिया में स्थिति भारत में इस समय दस प्रकार की भैंस पाई जाती हैं, जबकि कुल भैंस की संख्या देश में 95 मिलियन हैं, जिनमें दो करोड़ मुर्राह भैंस हैं। पचास फीसदी से अधिक हरियाणा व पंजाब में पाई जाती हैं। इंडिया दुग्ध उत्पादन में नंबर वन है, जबकि दूसरा स्थान अमेरिका का है। इंडिया में दुग्ध उत्पादन सौ मिलियन टन तक पहुंच चुका है, जिसमें भैंस से 56 व गाय से 42 फीसदी दूध मिलता है।
प्रयास तो शुरू कर दिए हैं: जोशी पशु अनुवांशिकी ब्यूरो करनाल के निदेशक डा. बीके जोशी का कहना है कि इंडिया में प्रयास शुरू हो चुके हैं, ताकि इस नस्ल को और सुधारा जा सके और विश्व लेवल पर अन्य भैंसों की किस्मों का मुकाबला किया जा सके।