शिमला.
लाहौल-स्पीति जिले की स्पीति घाटी के गियू गांव में 550 साल पुरानी ‘ममी’ के बाल और नाखून निकलने का धार्मिक आस्थाओं के लिहाज से तो महत्व हो सकता है लेकिन यह घटना मेडिकल साइंस की कसौटी पर खरी नहीं उतरती। गियू गांव की मोनेस्ट्री में रखी इस ममी के बाल और नाखून निकलने के बाद यह चर्चा में है।
एक मंदिर में रखी यह ममी वहां के लोगों की आस्था का प्रतीक है और लोग इसकी पूजा भी कर रहे हैं लेकिन मेडिकल साइंस लोगों की धार्मिक आस्थाओं पर सवाल उठाए बगैर इस ममी के बाल या नाखून निकलने की घटना से सहमत नहीं है।
कब मिली ममीइस ममी से जुड़े ऐतिहासिक तथ्यों के मुताबिक स्पीति घाटी के गियू गांव में 1975 में आईटीबीपी द्वारा खुदाई के दौरान यह ममी मिली। इस दौरान ममी के सिर पर हल्की चोट भी लगी। इसका निशान ममी के सिर पर आज भी मौजूद है। इसके बाद यहां बौद्ध धर्म के अनुयायियों द्वारा मंदिर बनाकर इस ममी को रखा गया। ममी को शीशे में रखा गया है और अब बताया जाता है कि ममी के बाल और नाखून निकल रहे हैं।
वैज्ञानिक आधार
मेडिकल साइंस की नजर से देखें तो कहा जाता है कि अगर वास्तव में 550 साल पुरानी इस ममी के बाल और नाखून निकल रहे हैं तो आज तक इसके बाल 2 मीटर और नाखून कम से कम 30 से 40 सेंटीमीटर के हो जाने चाहिए थे।
यही नहीं, वैज्ञानिक यह भी तर्क देते हैं कि अगर वाकई ऐसा है तो आज जितने बाल और नाखून हैं, उन्हें नापने के बाद अगले एक साल में चैक करके पता चल जाएगा कि कितने बाल और नाखून बढ़ेंगे। मेडिकल साइंस बाल और नाखून बढ़ने को प्रामाणिक नहीं मानता।
इच्छा के मुताबिक होती है अंत्येष्टिबौद्ध धर्म की मान्यता के मुताबिक लामा यानी बौद्ध धर्म गुरु निर्णय लेता है कि शव का अंतिम संस्कार किस रीति से किया जाए। इस रीति के मुताबिक शव को जलाने, दफनाने, बहाने से लेकर दूसरे कई रीति- रिवाजों से शव की अंत्येष्टि होती है।
उकड़ूं बैठी है ममीविभाग को भी इस ममी की जानकारी है। यह ममी उकड़ूं बैठी है। जहां तक बालों का सवाल है तो इस ममी के सिर्फ सिर पर बाल हैं। चमड़ी काली पड़ चुकी है और सूखी हुई भी है। इस ममी में हड्डियां नहीं हैंै। देखने पर लगता है कि यह किसी लामा की ममी है।
सुदर्शन वशिष्ठ, लेखक व पूर्व सचिव हिमाचल कला, संस्कृति व भाषा अकादमी
विभाग को इस बारे में जानकारी तो है कि स्पीति घाटी के गियू गांव में ऐसी एक ममी है लेकिन इसकी देखभाल का पूरा जिम्मा वहां का बौद्ध समुदाय ही उठा रहा है।
प्रेम शर्मा, निदेशक, हिमाचल कला, संस्कृति व भाषा विभाग
मेडिकल साइंस की नजर से देखें तो 550 साल बाद किसी भी मृत शरीर से बाल या नाखून नहीं निकल सकते लेकिन धार्मिक आस्था एक अलग चीज है।
डॉ. पीयूष कपिला, फोरेंसिक विशेषज्ञ, आईजीएमसी